ग़ज़ल

क़ाबू ख़िज़ाँ से ज़ोफ़ का गुलशन मैं बन गया

क़ाबू ख़िज़ाँ से ज़ोफ़ का गुलशन मैं बन गया

यह ग़ज़ल वियोग और बिछोह के दर्द को व्यक्त करती है, जहाँ शायर स्वयं को ख़ज़ाँ से ज़ोफ़ के गुलशन में स्थापित करता है। वह अपने प्रेम के रंग को हवा के स्पर्श पर बिखरा हुआ देखता है, और अपने वतन तथा प्रियजन की यादों के कारण हृदय के टूटने का दर्द बयान करता है।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
क़ाबू ख़िज़ाँ से ज़ोफ़ का गुलशन मैं बन गया दोश-ए-हवा पे रंग-ए-गुल-ओ-यासमन गया
मैं पतझड़ के आलिंगन से एक बाग़ बन गया, और हवा की साँस पर गुलाब और चमेली का रंग फैल गया।
2
बरगशता-बख़्त देख कि क़ासिद सफ़र से मैं भेजा था उस के पास सो मेरे वतन गया
बरगशता-बख़्त को देख कि क़ासिद सफ़र से मैं भेजा था उस के पास, जो मेरे वतन गया।
3
ख़ातिर-निशाँ ऐ सैद-फ़गन होगी कब तिरी तीरों के मारे मेरा कलेजा तो छन गया
ख़ातिर-निशाँ ऐ सैद-फ़गन होगी कब तिरी। तीरों के मारे मेरा कलेजा तो छन गया।
4
यादश-ब-ख़ैर दश्त में मानिंद-ए-अंकबूत दामन के अपने तार जो ख़ारों पे तन गया
यादश-ब-ख़ैर दश्त में मानिंद-ए-अंकबूत, जैसे एक मकड़ी रेगिस्तान में अपने ही रेशमी जाले पर बिछ जाती है, और वह जाला काँटों पर गिर जाता है।
5
मारा था किस लिबास में उर्यानी ने मुझे जिस से तह-ए-ज़मीन भी मैं बे-कफ़न गया
उर्यानी ने किस लिबास में मुझे मारा, जिससे तह-ए-ज़मीन में भी मैं बिना कफ़न के गया।
6
आई अगर बहार तो अब हम को क्या सबा हम से तो आशियाँ भी गया और चमन गया
अगर यह बहार है, तो अब हमारा क्या होगा? न तो महबूब का बसेरा रहा और न ही बाग़-बगीचा।
7
सरसब्ज़ मुल्क-ए-हिन्द में ऐसा हुआ कि 'मीर' ये रेख़्ता लिखा हुआ तेरा दकन गया
सरसब्ज़ मुल्क-ए-हिन्द में ऐसा हुआ कि 'मीर', ये रेख़्ता लिखा हुआ तेरा दकन गया। इसका शाब्दिक अर्थ है कि भारत की हरी-भरी भूमि में ऐसा कुछ घटित हुआ कि 'मीर', तुम्हारे दक्कन का क्षेत्र इस कविता की पंक्तियों में समा गया।
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