क़ाबू ख़िज़ाँ से ज़ोफ़ का गुलशन मैं बन गया — मीर तक़ी मीर
क़ाबू ख़िज़ाँ से ज़ोफ़ का गुलशन मैं बन गया
दोश-ए-हवा पे रंग-ए-गुल-ओ-यासमन गया
“From the autumn's embrace, I became a garden of roses, On the wind's breath, the color of flowers and jasmine was cast.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
मैं पतझड़ के आलिंगन से एक बाग़ बन गया, और हवा की साँस पर गुलाब और चमेली का रंग फैल गया।
विस्तार
यह शेर शायर के खुद को एक नए रूप में ढलने का एहसास कराता है। वह कहते हैं कि जहाँ कभी 'कबू ख़िज़ाँ' की उदासी थी, वहीं से वह खुद एक गुलशन बन गए। उनकी खुशबू, गुलाब और चमेली के रंगों की तरह, हवा के झोंके पर फैल गई। यह कविता सिखाती है कि निराशा में भी सुंदरता और जीवन कैसे खोजा जा सकता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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