ग़ज़ल
कल चमन में गुल-ओ-समन देखा
कल चमन में गुल-ओ-समन देखा
यह ग़ज़ल एक मनमोहक चमन के वर्णन से शुरू होती है, जहां शायर प्रकृति की सुंदरता और उसमें छिपे प्रेम के अहसास का वर्णन करता है। वह बताता है कि किस तरह एक साधारण बाग़ भी आशिक़ों का अपना 'जिला-वतन' बन जाता है, जिसमें प्रेम के गहरे रंग और यादें समाई होती हैं।
गीत सुनें
1
कल चमन में गुल-ओ-समन देखा
आज देखा तो बाग़ बन देखा
कल चमन में गुल-ओ-समन देखा, आज देखा तो पूरा बाग़ बन देखा।
2
क्या है गुलशन में जो क़फ़स में नहीं
आशिक़ों का जिला-वतन देखा
क्या है गुलशन में जो पिंजरे में नहीं, आशिक़ों का जिला-वतन देखा।
3
ज़ौक़ पैकान-ए-तीर में तेरे
मुद्दतों तक जिगर ने छिन देखा
तेरे तीरों के नशे में, मेरा दिल बहुत लंबे समय तक तड़पता रहा।
4
घर के घर जलते थे पड़े तेरे
दाग़-ए-दिल देखे बस चमन देखा
तेरे दाग़-ए-दिल की यादों से घर-घर जलते थे, लेकिन मैंने बस चमन देखा और दिल पर लगे दाग़ को भुला दिया।
5
एक चश्मक-ए-दो-सद सिनान-ए-मिज़ा
इस नुकीले का बाँकपन देखा
दो सौ सिनान के चश्मे जैसे, इस नुकीलेपन की मासूमियत को देखा।
6
शुक्र ज़ाहिद का अपनी आँखों में
मय-इवज़ ख़िरक़ा-ए-मरतुहिन देखा
ज़ाहिद ने अपनी आँखों में शुक्र (शुक्र ग्रह) को मय-इवज़ (शराब) और ख़िरक़ा-ए-मरतुहिन (प्रिय की चादर) देखा।
7
हसरत उस की जगह थी ख़्वाबीदा
'मीर' का खोल कर कफ़न देखा
हसरत उस की जगह थी ख़्वाबीदा, 'मीर' ने जब अपने खोलकर कफ़न को देखा।
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