ग़ज़ल
जब जुनूँ से हमें तवस्सुल था
जब जुनूँ से हमें तवस्सुल था
यह ग़ज़ल उस समय के बारे में है जब जुनून (दीवानगी) के माध्यम से हमें कोई साधन या सहारा मिला था। शायर कहते हैं कि जब तक हमारे पास जुनून था, तब तक हमें अपने बंधनों की कोई चिंता नहीं थी। यह बताता है कि वफ़ा और विश्वास की भावनाएं किस तरह जीवन के सबसे खूबसूरत और सबसे दर्दनाक अनुभवों का कारण बन सकती हैं।
गीत सुनें
1
जब जुनूँ से हमें तवस्सुल था
अपनी ज़ंजीर-ए-पा ही का ग़ुल था
जब जुनून के माध्यम से हमें तवस्सुल (रास्ता) मिला, तो वह हमारी अपनी ज़ंजीर का ही गुच्छा था।
2
बिस्तरा था चमन में जों बुलबुल
नाला सर्माया-ए-तवक्कुल था
चमन में जो बुलबुल का बिस्तरा था, और नाला सर्माया-ए-तवक्कुल था।
3
यक निगह को वफ़ा न की गोया
मौसम-ए-गुल सफ़ीर-ए-बुलबुल था
जैसे मैंने अपनी आँखों से वफ़ा नहीं रखी, मैं फूलों का मौसम और बुलबुल का दूत था।
4
उन ने पहचान कर हमें मारा
मुँह न करना इधर तजाहुल था
उन्होंने पहचान कर हमें मारा; मुँह न करना इधर तजाहुल था।
5
शहर में जो नज़र पड़ा उस का
कुश्ता-ए-नाज़ या तग़ाफ़ुल था
शहर में जो नज़र पड़ा उस का, वह या तो नज़ाकत का लिबास था या फिर बेपरवाही।
6
अब तो दिल को न ताब है न क़रार
याद-ए-अय्याम जब तहम्मुल था
अब तो दिल को न ताब है न क़रार, याद-ए-अय्याम जब तहम्मुल था। इसका अर्थ है कि अब मन में न तो हिम्मत है और न ही शांति, जबकि पहले बीते हुए दिनों को सहना संभव था।
7
जा फँसा दाम-ए-ज़ुल्फ़ में आख़िर
दिल निहायत ही बे-ताम्मुल था
जा फँसा दाम-ए-ज़ुल्फ़ में आख़िर, इसका अर्थ है कि अंततः (आखिर) मैं आपके ज़ुल्फ़ों के जाल (दाम-ए-ज़ुल्फ़) में फँस गया, और मेरा दिल पूरी तरह से बेपरवाह (बे-ताम्मुल) हो गया।
8
यूँ गई क़द के ख़म हुए जैसे
उम्र इक रहरव सर-ए-पुल था
जैसे क़द के ख़ाम (कमियाँ) दूर हो गए, ठीक वैसे ही जैसे एक नटखट धारा पुल के ऊपर से बह जाती है।
9
ख़ूब दरयाफ़्त जो किया हम ने
वक़्त-ए-ख़ुश 'मीर' निकहत-ए-गुल था
मैंने जो बहुत प्रयास किया, वक़्त-ए-ख़ुश, मेरे लिए बस गुलाब की ख़ुशबू के साथ होना था।
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