ग़ज़ल

क्या मिरे आने पे तू ऐ बुत-ए-मग़रूर गया

क्या मिरे आने पे तू ऐ बुत-ए-मग़रूर गया

यह ग़ज़ल एक विरहपूर्ण संवाद है, जिसमें शायर अपने महबूब से पूछता है कि क्या उसके आने से वह घमंडी मूर्ति (बुत-ए-मग़रूर) विचलित हो गई। यह कविता वियोग और निराशा के गहरे भावों को व्यक्त करती है, जिसमें प्रेमी को प्रेम के नाम पर दिए गए दर्द और टूटे वादों का एहसास होता है।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
क्या मिरे आने पे तू ऐ बुत-ए-मग़रूर गया कभी उस राह से निकला तो तुझे घूर गया
मेरे आने पर क्या तू ऐ घमंडी मूर्ति चली गई? जब तू उस राह से निकली तो मैंने तुझे घूर दिया।
2
ले गया सुब्ह के नज़दीक मुझे ख़्वाब ऐ वाए आँख उस वक़्त खुली क़ाफ़िला जब दूर गया
सुबह के नज़दीक मुझे ख़्वाब में ले गया, ऐ वाए। मेरी आँखें उस वक़्त खुली जब क़ाफ़िला बहुत दूर जा चुका था।
3
गोर से नाले नहीं उठते तो नय उगती है जी गया पर न हमारा सर पुर-शोर गया
अगर नालों से धाराएँ नहीं उठतीं, तो नए पौधे नहीं उगते; लेकिन अगर हमारा सर शोर से भरा होता, तो भी ऐसा नहीं होता।
4
चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता से कल रात लहू फिर टपका हम ने जाना था कि बस अब तो ये नासूर गया
आँखों के रक्त-जमे थैले से कल रात फिर खून टपका, हम जान चुके थे कि बस अब तो ये नासूर गया।
5
ना-तवाँ हम हैं कि हैं ख़ाक गली की उस की अब तो बे-ताक़ती से दिल का भी मक़्दूर गया
क्या हम उस गली की धूल हैं, ऐ प्रिय, या नहीं? अब तो कमजोरी से दिल का भी भाग्य चला गया।
6
ले कहीं मुँह पे नक़ाब अपने कि ऐ ग़ैरत-ए-सुब्ह शम्अ' के चहरा-ए-रख्शां से तो अब नूर गया
ऐ सुबह की शान, अपना मुखौटा मत ओढ़ो, क्योंकि महबूब के मुख की चमक से तो अब रोशनी चली गई है।
7
नाला-ए-मीर नहीं रात से सुनते हम लोग क्या तिरे कूचे से ऐ शोख़ वो रंजूर गया
हम लोग रात से नाला-ए-मीर नहीं सुन रहे हैं, क्या तुम्हारे मोहक रास्ते से ऐ शोख़ वह उदास साथी चला गया।
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