ले कहीं मुँह पे नक़ाब अपने कि ऐ ग़ैरत-ए-सुब्ह — मीर तक़ी मीर

ले कहीं मुँह पे नक़ाब अपने कि ऐ ग़ैरत-ए-सुब्ह शम्अ' के चहरा-ए-रख्शां से तो अब नूर गया

“Do not hide your face behind a veil, oh pride of the morning, For from the radiance of the beloved's face, the light has now departed.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

ऐ सुबह की शान, अपना मुखौटा मत ओढ़ो, क्योंकि महबूब के मुख की चमक से तो अब रोशनी चली गई है।

विस्तार

यह शेर सुबह (ग़ैरत-ए-सुब्ह) से एक विनती है, कि वह अपना नक़ाब हटा दे। शायर कहते हैं कि महबूब का चेहरा इतना नूरानी है, कि सुबह की अपनी चमक भी फीकी पड़ गई है। यह इश्क़ की उस ताकत को बयां करता है, जहाँ महबूब की सुंदरता हर प्राकृतिक रौशनी को मात दे देती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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