Sukhan AI
ग़ज़ल

पीरी में क्या जवानी के मौसम को रोइए

पीरी में क्या जवानी के मौसम को रोइए

यह ग़ज़ल जीवन के क्षणभंगुर सौंदर्य और वर्तमान में जीने का संदेश देती है। यह बताती है कि यौवन के मौसम में शोक करना व्यर्थ है, क्योंकि सुबह होने वाली है और जीवन का आनंद लेना चाहिए। इसमें समय को व्यर्थ न करने और प्रेम तथा जीवन के वास्तविक अनुभवों को महत्व देने की बात कही गई है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
पीरी में क्या जवानी के मौसम को रोइए अब सुब्ह होने आई है इक दम तो सोइए
बिस्तर पर जवानी के मौसम के लिए रो मत, अब सुबह होने आई है, तुम बस सो जाओ।
2
रुख़्सार उस के हाए रे जब देखते हैं हम आता है जी में आँखों को उन में गड़ोइए
जब हम उसके गालों को देखते हैं, तो हमें कैसा महसूस होता है। हमारी आँखें उन आँखों में खो जाती हैं, जहाँ हम उन्हें छिपाना चाहते हैं।
3
इख़्लास दिल से चाहिए सज्दा नमाज़ में बे-फ़ाएदा है वर्ना जो यूँ वक़्त खोइए
नमाज़ के सज्दे में दिल से इख्लास चाहिए, वरना यूँ वक़्त बर्बाद करना बेकार है।
4
किस तौर आँसुओं में नहाते हैं ग़म-कशाँ इस आब-ए-गर्म में तो उँगली डुबोइए
शायर पूछ रहा है कि तुम किस तरह आँसुओं में नहाते हो, ऐ ग़म-कशाँ। यह गर्म पानी है, इसमें अपनी उँगली मत डुबोना।
5
मतलब को तो पहुँचते नहीं अंधे के से तौर हम मारते फिरे हैं यू नहीं टप्पे टोइए
मतलब को तो पहुँचते नहीं अंधे के से तौर, हम मारते फिरे हैं यू नहीं टप्पे टोइए। इसका शाब्दिक अर्थ है कि अंधे व्यक्ति के तरीके से मतलब तक पहुँचना संभव नहीं है; हम यहाँ सिर्फ समय बिता रहे हैं, इसलिए रात खराब मत करो।
6
अब जान जिस्म-ए-ख़ाकी से तंग गई बहुत कब तक इस एक टोकरी मिट्टी को ढोईए
मेरा मन इस नश्वर शरीर से बहुत तंग आ चुका है; आप कब तक इस एक टोकरी मिट्टी को उठाते रहेंगे।
7
आलूदा उस गली की जो हूँ ख़ाक से तो 'मीर' आब-ए-हयात से भी वे पाँव धोइए
आलूदा उस गली की जो मैं हूँ ख़ाक से तो 'मीर', आब-ए-हयात से भी न वे पाँव धोइए। इसका अर्थ है कि मैं एक ऐसी गली हूँ जो आपके लिए केवल धूल के समान है, इसलिए मेरे पैरों को जीवन के जल से भी न धोना।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.

पीरी में क्या जवानी के मौसम को रोइए | Sukhan AI