ग़ज़ल

शब शम्अ' पर पतंग के आने को इश्क़ है

शब शम्अ' पर पतंग के आने को इश्क़ है

यह ग़ज़ल प्रेम को एक नशीले और कभी-कभी कष्टदायक अनुभव के रूप में देखती है। कवि कहता है कि प्रेम का आकर्षण उस रात में पतंग के आने जैसा है, जो एक सहज और अनियंत्रित आनंद है। यह प्रेम ही है जो दिल-जले के ताब लाने, मर्दाना जीवन जीने, और यहाँ तक कि ज़माने को आवारगी से सताने की प्रेरणा देता है।

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लिपि व अर्थ
1
शब शम्अ' पर पतंग के आने को इश्क़ है उस दिल-जले के ताब के लाने को इश्क़ है
शब शम्अ' पर पतंग के आने को इश्क़ है, उस दिल-जले के ताब के लाने को इश्क़ है। (अर्थात, यह प्रेम है जो लज्जा की शाखा पर पतंग के आने का इंतज़ार करता है, और यह प्रेम है जो दिल जलने के अंगारे के आने का इंतज़ार करता है।)
2
सर मार मार संग से मर्दाना जी दिया फ़रहाद के जहान से जाने को इश्क़ है
सर मार मार संग से मर्दाना जी दिया। फ़रहाद के जहान से जाने को इश्क़ है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि मर्दाना जी ने तीरंदाजी का खेल (सर मार मार) के साथ एक मर्दाना उपहार दिया है, और यह इश्क़ (प्रेम) है जो फ़रहाद के संसार से दूर जाने का कारण बनता है।
3
उठियो समझ के जा से कि मानिंद-ए-गर्द-बाद आवारगी से तेरी ज़माने को इश्क़ है
उठो और समझो, ऐ प्रिय, कि यह तुम्हारे युग का प्रेम है, न कि केवल धूल का उड़ना।
4
बस ऐ सिपहर सई से तेरी तो रोज़-ओ-शब याँ ग़म सताने को है जलाने को इश्क़ है
बस तेरे लिए, ऐ सवेरे, रातें और दिन ग़म से सताने और जला देने वाले हैं, यह इश्क़ है।
5
बैठी जो तेग़-ए-यार तो सब तुझ को खा गई ऐ सीने तेरे ज़ख़्म उठाने को इश्क़ है
प्रियतम का जो बाण वहाँ बैठा था, उसने सब कुछ भस्म कर दिया। / ऐ, तेरे सीने पर ज़ख्म सहने को इश्क़ है।
6
इक दम में तू ने फूँक दिया दो-जहाँ के तीं ऐ इश्क़ तेरे आग लगाने को इश्क़ है
पल भर में तूने दो जहानों के तीरों में साँस फूँक दी। ऐ इश्क़, तेरे आग लगाने को भी इश्क़ ही है।
7
सौदा हो तब हो 'मीर' को तो करिए कुछ इलाज उस तेरे देखने के दिवाने को इश्क़ है
अगर तुम्हें कोई सौदा करना है, तो मीर की परेशानी को कुछ करो। यह तो प्यार है जो तुम्हें देखने वाले दीवाने को सताता है।
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