ग़ज़ल

दिल के मामूरे की मत कर फ़िक्र फ़ुर्सत चाहिए

दिल के मामूरे की मत कर फ़िक्र फ़ुर्सत चाहिए

यह ग़ज़ल बताती है कि किसी के दिल के मामले की चिंता करने के बजाय, जीवन में शांति और खाली समय की ज़रूरत होती है। यह बताती है कि सच्चे प्यार और मस्ती को जीने के लिए एक दरवेशी जैसी सादगी चाहिए, और किसी भी असफल प्रयास के लिए दौलत की आवश्यकता होती है। इसमें कवि कहते हैं कि एक कवि के लिए भी, कला के सामने खड़े होने की हिम्मत और क्षमता चाहिए।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
दिल के मामूरे की मत कर फ़िक्र फ़ुर्सत चाहिए ऐसे वीराने के अब बसने को मुद्दत चाहिए
दिल के मामूरे की मत कर फ़िक्र, फ़ुर्सत चाहिए। ऐसे वीराने के अब बसने को मुद्दत चाहिए।
2
इशक़-ओ-मय-ख़्वारी निभे है कोई दरवेशी के बीच इस तरह के ख़र्ज-ए-ला-हासिल को दौलत चाहिए
इश्क़ और मय-ख़्वारी (प्रेम और शराब के मद में जीना) दरवेशी के बीच कैसे कायम रह सकता है? इस तरह के बिना हासिल खर्चों को पूरा करने के लिए दौलत की ज़रूरत है।
3
'आक़िबत फ़रहाद मर कर काम अपना कर गया आदमी होवे किसी पेशे में जुरअत चाहिए
फ़रहाद मरने के बाद अपना काम करके चला गया; किसी भी पेशा में आदमी को हिम्मत चाहिए।
4
हो तरफ़ मुझ पहलवाँ शा'इर का कब 'आजिज़ सुख़न सामने होने को साहब फ़न के क़ुदरत चाहिए
ऐ अजीज़, मैं पहलवानी शायर के रूप में कब तक ऐसे शानदार शेर कह पाऊँगा? साहब के सामने खड़े होने के लिए कला की प्रकृति/शक्ति चाहिए।
5
'इश्क़ में वस्ल-ओ-जुदाई से नहीं कुछ गुफ़्तुगू क़ुर्ब-ओ-बोद उस जा बराबर है मोहब्बत चाहिए
प्रेम में मिलन और विरह से कोई बात नहीं है। निकटता और दूरी बराबर हैं, बस मोहब्बत चाहिए।
6
नाज़ुकी को 'इश्क़ में क्या दख़्ल है ऐ बुल-हवस याँ स'ऊबत खींचने को जी में ताक़त चाहिए
नाज़ुकी को 'इश्क़ में क्या दख़ल है ऐ बुल-हवस, यारों स'ऊबत खींचने को जी में ताक़त चाहिए। शायर कह रहा है कि प्रेम में नाज़ुकी का क्या काम, ऐ बुलाने वाली वासना, दोस्तों के साथ समय बिताने के लिए मन में ताकत चाहिए।
7
तंग मत हो इब्तिदा-ए-आशिक़ी में इस क़दर ख़ैरियत है 'मीर' साहिब दिल सलामत चाहिए
तंग मत हो इब्तिदा-ए-आशिक़ी में इस क़दर, क्योंकि ऐ मीर साहब, तुम्हारा दिल सलामत चाहिए।
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