हो तरफ़ मुझ पहलवाँ शा'इर का कब 'आजिज़ सुख़न — मीर तक़ी मीर

हो तरफ़ मुझ पहलवाँ शा'इर का कब 'आजिज़ सुख़न सामने होने को साहब फ़न के क़ुदरत चाहिए

“How many times will I, the wrestler-poet, speak such verses, O Aziz? To stand before the master of art, the nature (or essence) of skill is needed.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

ऐ अजीज़, मैं पहलवानी शायर के रूप में कब तक ऐसे शानदार शेर कह पाऊँगा? साहब के सामने खड़े होने के लिए कला की प्रकृति/शक्ति चाहिए।

विस्तार

यह शेर बताता है कि कला की गहराई कितनी बड़ी होती है। शायर कहते हैं कि एक बेहतरीन शायर के लफ़्ज़ों की शान, वो चीज़ नहीं है जो सिर्फ़ देखकर समझ आ जाए। उस कला के जादू को महसूस करने के लिए, नज़रों से ज़्यादा दिल को फ़न की रूह की ज़रूरत होती है। यह एक बहुत गहरा फ़लसफ़ा है!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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