ग़ज़ल

बग़ैर दिल कि ये क़ीमत है सारे आलम की

बग़ैर दिल कि ये क़ीमत है सारे आलम की

यह ग़ज़ल बताती है कि किसी के दिल की कीमत पूरी दुनिया से ज़्यादा है। वक्ता कहता है कि उसकी सुंदरता और प्रेम का जादू किसी के भी काम नहीं आता, और वह अपने महबूब से दुनिया के ऐश और बहरम के बारे में पूछना चाहता है। अंत में, वह महबूब से केवल बाग़ की तकलीफ़ से दूर रहने की गुहार लगाता है, क्योंकि वह मातम की रस्मों से दूर है।

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लिपि व अर्थ
1
बग़ैर दिल कि ये क़ीमत है सारे आलम की कसो से काम नहीं रखती जिंस आदम की
दिल के बिना यह पूरी दुनिया की कीमत है। यह इंसान की प्रकृति के साथ काम नहीं करती।
2
कोई हो महरम शोख़ी तिरा तो में पूछूँ कि बज़्म-ए-ऐश जहाँ क्या समझ के बरहम की
यदि तुम मेरी गोपनीय साथी हो, तो मुझे बताओ कि इस दुनिया में आनंद का सार क्या है जिसे तुम त्याग देती हो।
3
हमें तो बाग़ की तकलीफ़ से मुआ'फ़ रखो कि सैर-ओ-गशत नहीं रस्म अहल-ए-मातम की
मुझे तो बाग़ की परेशानी से बचाकर रखना, क्योंकि सैर-ओ-गश्त (घूमना-फिरना) तो मातम के लोगों का रिवाज नहीं है।
4
तनिक तो लुत्फ़ से कुछ कह कि जाँ-ब-लब हूँ मैं रही है बात मिरी जान अब कोई दम की
बस थोड़ी सी मिठास से कुछ कह दो, क्योंकि मैं तो आनंद की चाह रखने वाला दिल हूँ; मेरी जान से बातें अब किसी ताक़त की नहीं रही।
5
गुज़रने को तो कज-ओ-वाकज अपनी गुज़रे है जफ़ा जो उन ने बहुत की तो कुछ वफ़ा कम की
गुज़रने पर मेरा अपना दर्द गुज़र गया; अगर उन्होंने बहुत बेवफ़ाई की, तो उन्होंने अपनी वफ़ादारी कम कर दी।
6
घिरे हैं दर्द-ओ-अलम में फ़िराक़ के ऐसे कि सुब्ह-ए-ईद भी याँ शाम है महरम की
फ़िराक़ के दर्द और गम में ऐसे डूबे हुए हैं कि ईद की सुबह भी महबूब की शाम जैसी लगती है।
7
क़फ़स में 'मीर' नहीं जोश दाग़ सीने पर हवस निकाली है हम ने भी गुल के मौसम की
क़फ़स में 'मीर' नहीं जोश दाग़ सीने पर हवस निकाली है हम ने भी गुल के मौसम की
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