ग़ज़ल
दिल पे ख़ूँ है यहाँ तुझ को गुमाँ है शीशा
दिल पे ख़ूँ है यहाँ तुझ को गुमाँ है शीशा
यह ग़ज़ल दर्शाती है कि दिल पर खून होने के बावजूद, आपको शीशे में जो भ्रम है, वह झूठा है। कवि कहता है कि महफ़िल में हर पलक पर आँसुओं से भीगा हुआ शीशा है, और यह भ्रम केवल नशे में देखने आने वाली आँखों की शरारत है।
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1
दिल पे ख़ूँ है यहाँ तुझ को गुमाँ है शीशा
शैख़ क्यूँ मस्त हुआ है तू कहाँ है शीशा
दिल पर खून है यहाँ, और तुझे शीशे से भ्रम है; शायर क्यों मदहोश हुआ है? शीशा कहाँ है?
2
शीशा-बाज़ी तो तनिक देखने आ आँखों की
हर पलक पर मिरे अश्कों से रवाँ है शीशा
आँखों के लिए शीशे का खेल तो बस देखना है, / हर पलक पर मेरा शीशा मेरे आँसुओं से बह रहा है।
3
रू-सफेदी है नक़ाब-ए-रुख़-ए-शोर-ए-मस्ती
रीश-ए-क़ाज़ी के सबब पुम्बा-दहाँ है शीशा
मस्ती के शोर के चेहरे पर जो सफेदी का नक़ाब है, वह काज़ी की दाढ़ी के कारण चमकता हुआ शीशा है।
4
मंज़िल-ए-मस्ती को पहुँचे है उन्हें से 'आलम
निशा-ए-मै-बलद ओ संग-ए-निशाँ है शीशा
मंज़िल-ए-मस्ती (मस्ती का गंतव्य) तक पहुँचने के लिए उन्हें 'आलम' मिला है; और मेरे शहर की रात (निशा) और निशान का शीशा (आईना) है।
5
दरमियाँ हल्का-ए-मस्तताँ के शब उस की जा थी
दौर-ए-साग़र में मगर पीर-ए-मुग़ाँ है शीशा
दरमियाँ हल्का-ए-मस्तताँ के शब उस की जा थी, दौर-ए-साग़र में मगर पीर-ए-मुग़ाँ है शीशा।
6
जा के पूछा जो मैं ये कार-गह-ए-मीना में
दिल की सूरत का भी ऐ शीशा-गराँ है शीशा
जब मैंने बाज़ार के इस नज़ारे के बारे में पूछा, ऐ दिल के शीशे, तो तुमने कहा कि दिल का नज़ारा भी बहुत कीमती है।
7
कहने लागे कि किधर फिरता है बहका ऐ मस्त
हर तरह का जो तू देखे है कि याँ है शीशा
कहने लगे कि तुम कहाँ घूमते हो, हे मदहोश! जो भी तरह का दृश्य तुम देखते हो, क्या यह शीशा है?
8
दिल ही सारे थे पे इक वक़्त में जो कर के गुदाज़
शक्ल शीशे की बनाए हैं कहाँ है शीशा
एक पल में सारे दिल गुदाज़ के खेल में कैद हो गए, पर शीशे की शक्ल कहाँ है?
9
झुक गया देख के मैं 'मीर' उसे मज्लिस में
चश्म-ए-बद-दूर तरहदार जवाँ है शीशा
देखकर उसे मज्लिस में मैं 'मीर' झुक गया। उसकी आँखें दूर के, तरहदार शीशे जैसी हैं, जो कि जवानी की हैं।
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