दरमियाँ हल्का-ए-मस्तताँ के शब उस की जा थी — मीर तक़ी मीर

दरमियाँ हल्का-ए-मस्तताँ के शब उस की जा थी दौर-ए-साग़र में मगर पीर-ए-मुग़ाँ है शीशा

“In the nights, she was light like intoxication, but in the era of the sea, her mirror is a cup of wine.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

दरमियाँ हल्का-ए-मस्तताँ के शब उस की जा थी, दौर-ए-साग़र में मगर पीर-ए-मुग़ाँ है शीशा।

विस्तार

मिर्ज़ा तक़ी मीर का यह शेर जीवन की सच्चाई और भ्रम के बीच के रिश्ते को समझाता है। पहले मिसरे में कहा गया है कि महबूब की मस्ती भरी रात बस एक पल का एहसास थी। लेकिन दूसरे मिसरे में कहते हैं कि विशाल समंदर में भी, 'पीर-ए-मुग़ाँ' ने एक शीशे जैसा भ्रम रचा है। इसका मतलब है कि जीवन का कोई भी अनुभव, चाहे वह कितना भी गहरा या बड़ा लगे, अंत में एक नश्वर प्रतिबिंब ही होता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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