रू-सफेदी है नक़ाब-ए-रुख़-ए-शोर-ए-मस्ती — मीर तक़ी मीर

रू-सफेदी है नक़ाब-ए-रुख़-ए-शोर-ए-मस्ती रीश-ए-क़ाज़ी के सबब पुम्बा-दहाँ है शीशा

“The whiteness of the veil over the face of intoxication, Is the mirror that shines because of the beard of the Qazi.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

मस्ती के शोर के चेहरे पर जो सफेदी का नक़ाब है, वह काज़ी की दाढ़ी के कारण चमकता हुआ शीशा है।

विस्तार

यह शेर न सिर्फ़ चेहरे की ऊपरी चमक की बात करता है, बल्कि दिखावे और वास्तविकता के बीच के फ़र्क़ को भी दिखाता है। शायर कहते हैं कि यह सफेदी तो बस एक नक़ाब है, जो मस्ती के शोर में छुपाया गया है। दूसरी लाइन बताती है कि किसी साधारण चीज़ में भी, किसी बड़े या सम्मानित व्यक्ति की वजह से एक तरह की 'सजावट' हो जाती है। यह शेर हमें हर चीज़ पर सवाल उठाने को कहता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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