ग़ज़ल
ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो
ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो
ये ग़ज़ल बताती है कि किसी को भी सादा ख़त पढ़कर ऊबना नहीं चाहिए, क्योंकि हर शख़्स की अपनी कहानी होती है। शायर अपनी मुहब्बत और चाहत को व्यक्त करने के लिए किसी भी अंदाज़ का सहारा लेने को तैयार है, और अपने इश्क़ की राह में हर चीज़ को एक फूल सा मानना चाहता है।
गीत सुनें
1
ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो
हम तो हूँ बद-गुमान जो क़ासिद-ए-रसूल हो
पत्र लिखते समय उसे सादा नहीं होना चाहिए, क्योंकि मैं वह हूँ जो रसूल-ए-खुदा की चाहत में ग़लतफ़हमी में है।
2
चाहूँ तो भर के कौली उठा लूँ अभी तुम्हें
कैसे ही भारी हो मिरे आगे तो फूल हो
अगर मैं चाहूँ तो अभी तुम्हें कौली भरकर उठा सकता हूँ, पर तुम मेरे लिए बहुत हल्की हो।
3
सुर्मा जो नूर बख़्शे है आँखों को ख़ल्क़ की
शायद कि राह-ए-यार की ही ख़ाक धूल हो
जो काजल (सुर्मा) ने आँखों को नूर दिया है पूरी सृष्टि को, शायद वह महबूब के रास्ते की ही धूल हो।
4
जावें निसार होने को हम किस बिसात पर
इक नीम जाँ रखें हैं सो वो जब क़ुबूल हो
निसार होने को हम किस बिसात पर जाएँ, यदि एक नीम जान रखना है, तो वह जब स्वीकार हो।
5
हम इन दिनों में लग नहीं पड़ते हैं सुब्ह-ओ-शाम
वर्ना दु'आ करें तो जो चाहें हुसूल हो
हम इन दिनों में सुबह-ओ-शाम का जाप नहीं करते हैं, वरना दुआ करें तो जो कुछ चाहें वह मिल जाएगा।
6
दिल ले के लौंडे दिल्ली के कब का पचा गए
अब उन से खाई पी हुई शय क्या वसूल हो
दिल्ली के लड़कों ने मेरा दिल कब का पचा लिया है। अब उनसे जो कुछ भी खाया-पिया है, उसका क्या मज़ा आएगा।
7
नाकाम इस लिए हो कि चाहो हो सब कुछ आज
तुम भी तो 'मीर' साहिब-ओ-क़िबला अजूल हो
यह असफलता नहीं है जिसके कारण तुम आज सब कुछ चाहते हो, तुम भी तो 'मीर' साहिब-ओ-क़िबला अजूल हो।
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