जावें निसार होने को हम किस बिसात पर — मीर तक़ी मीर
“Upon what platform shall we depart, being resigned to fate, If just one life we keep, and that is accepted by them?”
अर्थ
निसार होने को हम किस बिसात पर जाएँ, यदि एक नीम जान रखना है, तो वह जब स्वीकार हो।
विस्तार
यह शेर समर्पण और नियति के सामने झुक जाने की बात करता है। शायर पूछते हैं कि हम किस मौके पर खुद को कुर्बान करने के लिए तैयार होते हैं? फिर वह कहते हैं कि हमने तो बस एक छोटी सी जान बचा रखी है; बस यही स्वीकार कर लिया जाए। यह एक गहरा एहसास है, जो बताता है कि जीवन की सबसे बड़ी कीमत, हमारी विनम्रता और स्वीकार्यता में है।
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