ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो — मीर तक़ी मीर

ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो हम तो हूँ बद-गुमान जो क़ासिद-ए-रसूल हो

“If writing a letter, let it not be mundane and common, I am the one who is mistaken in pursuing the Messenger of God.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

पत्र लिखते समय उसे सादा नहीं होना चाहिए, क्योंकि मैं वह हूँ जो रसूल-ए-खुदा की चाहत में ग़लतफ़हमी में है।

विस्तार

यह शेर बताता है कि दुनियावी प्रेम और रूहानी चाहत में क्या फ़र्क़ होता है। शायर कहते हैं कि मैं चिंतित हूँ कि मेरा लिखा हुआ कोई भी सादा ख़त महबूब को ऊबाऊ न लगे। लेकिन, असल परेशानी तो किसी और चीज़ में है—कि मैं तो क़ासिद-ए-रसूल हूँ। यानी, मेरा असली ज़िक्र और मेरा असली डर तो उस रूहानी सफ़र का है, न कि किसी महबूब की बेरुख़ी का।

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