ग़ज़ल
ख़ूब-रू सब की जान होते हैं
ख़ूब-रू सब की जान होते हैं
यह ग़ज़ल बताती है कि हर खूबसूरत चीज़ या व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है, और जीवन में हर कोने में कोई न कोई बात छिपी होती है। वक्ता कहता है कि दुनिया के हर हिस्से में कोई न कोई जीवन होता है, और किसी भी जगह को खाली नहीं छोड़ा जा सकता।
गीत सुनें
1
ख़ूब-रू सब की जान होते हैं
आरज़ू-ए-जहान होते हैं
खूबसूरत लोग सभी के लिए जान होते हैं, वे पूरी दुनिया की आरज़ू होते हैं।
2
गोश-ए-दीवार तक तू जा नाले
उस में गुल को भी कान होते हैं
नाले के कोने तक जाना है, क्योंकि वहां के फूल को भी सुनने की क्षमता होती है।
3
कभू आते हैं आप में तुझ बिन
घर में हम मेहमान होते हैं
जब आप यहाँ नहीं होते हैं, तो मैं अपने ही घर में एक मेहमान जैसा होता हूँ।
4
दश्त के फूटे मक़बरों पे न जा
रौज़े सब गुलसिताँ होते हैं
रेगिस्तान के टूटे मकबरों पर मत जाना; सभी मज़ार बाग़ होते हैं।
5
हर्फ़-ए-तल्ख़ उन के क्या कहूँ मैं ग़रज़
ख़ूब-रू बद-ज़बान होते हैं
उनके कड़वे शब्दों के बारे में मैं क्या कहूँ, हे ग़रज़? सुंदर लोग ही बदज़बान होते हैं।
6
ग़म्ज़ा-ए-चश्म ख़ुश-क़दान-ए-ज़मीं
फ़ित्ना-ए-आसमान होते हैं
आँखों की उदासी, ज़मीन की सुंदरता, आसमान के फ़ितने होते हैं।
7
क्या रहा है मुशा'एरे में अब
लोग कुछ जम' आन होते हैं
मुशायरे में अब क्या हो रहा है? लोग काफी उत्साहित हो रहे हैं।
8
'मीर'-ओ-'मिर्ज़ा-रफ़ी' व 'ख़्वाजा-मीर'
कितने इक ये जवान होते हैं
शायर कहते हैं कि ऐसे कितने जवान लोग होते हैं।
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