हर्फ़-ए-तल्ख़ उन के क्या कहूँ मैं ग़रज़ — मीर तक़ी मीर
हर्फ़-ए-तल्ख़ उन के क्या कहूँ मैं ग़रज़
ख़ूब-रू बद-ज़बान होते हैं
“How can I speak of their bitter words? The beautiful ones are often ill-mannered.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
उनके कड़वे शब्दों के बारे में मैं क्या कहूँ, हे ग़रज़? सुंदर लोग ही बदज़बान होते हैं।
विस्तार
यह शेर इंसान के दोहरेपन पर एक गहरा तंज है। शायर पूछ रहे हैं कि ऐसे लोगों के कड़वे शब्दों का क्या गिला किया जाए। वो कहते हैं कि ये लोग बाहर से बहुत प्यारे लगते हैं, लेकिन ज़बान से बहुत ज़हरीले होते हैं। यह उन रिश्तों की बात करता है, जहाँ दिखावा ज़्यादा होता है और सच्चाई बहुत कड़वी। एक बहुत ही दर्द भरा एहसास है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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