ग़ज़ल

दा'वे को यार आगे मायूब कर चुके हैं

दा'वे को यार आगे मायूब कर चुके हैं

यह ग़ज़ल प्रेम और प्रेम की माँगों को लेकर एक मज़ेदार और आत्मविश्वासी अंदाज़ प्रस्तुत करती है। शायर कहते हैं कि वे प्रेम की माँगों को निभा चुके हैं और इस रिश्ते को ख़ूब संभाल चुके हैं। इसमें एक तरह की चुनौती भी है कि अगर प्रेम ने धोखा दिया तो इसके परिणाम भी गंभीर होंगे।

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लिपि व अर्थ
1
दा'वे को यार आगे मायूब कर चुके हैं इस रेख़्ते को वर्ना हम ख़ूब कर चुके हैं
दावे को यार आगे मायूब कर चुके हैं, इस रिश्ते को वरना हम ख़ूब कर चुके हैं। इसका अर्थ है कि प्रिय ने पहले ही प्रेम का वादा किया है, और अगर इस रिश्ते को नहीं निभाया गया तो हम बहुत परेशान हो जाएँगे।
2
मरने से तुम हमारे ख़ातिर नचंत रखियो उस काम का भी हम कुछ उस्लूब कर चुके हैं
मरने से तुम हमारे ख़ातिर नचंत रखियो, उस काम का भी हम कुछ उस्लूब कर चुके हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है कि मेरे लिए, मरने के बाद भी तुम नाचना मत छोड़ना; हम उस कार्य के लिए भी कुछ ढंग (तरीका) सीख चुके हैं।
3
हुस्न-ए-कलाम खींचे क्यूँकर न दामन-ए-दिल इस काम को हम आख़िर महबूब कर चुके हैं
वाणी की सुंदरता हृदय के पल्लू को कैसे न खींच सकती है? प्रिय, हम इस कार्य के अभ्यस्त हो चुके हैं।
4
हंगामा-ए-क़यामत ताज़ा नहीं जो होगा हम इस तरह के कितने आशोब कर चुके हैं
प्रलय का कोलाहल, अगर आएगा तो नया नहीं होगा, हम इस तरह के कितने उथल-पुथल से गुज़र चुके हैं।
5
रंग-ए-परीदा क़ासिद बाद-ए-सहर कबूतर किस किस के हम हवाले मक्तूब कर चुके हैं
परी की रंगत, सुबह की हवा का संदेशवाहक, कबूतर। हम यह पत्र किस-किस को संबोधित कर चुके हैं।
6
तिनका नहीं रहा है क्या अब निसार करिए आगे ही हम तो घर को जारूब कर चुके हैं
क्या हमारे जीवन का थोड़ा सा तिनका भी नहीं बचा है? क्या आप हमें थोड़ा और दे सकते हैं? हमने तो अपने घर को पहले ही जारूब (राख) में मिला दिया है।
7
हर लहज़ा है तज़ायुद रंज-ओ-ग़म-ओ-अलम का ग़ालिब कि तबा-ए-दिल को मग़्लूब कर चुके हैं
हर शब्द में रंज, गम और दर्द की वृद्धि है, ग़ालिब ने दिल के तबा-ए-हाल को भी वश में कर लिया है।
8
क्या जानिए कि क्या है ऐ 'मीर' वज्ह ज़िद की सौ बार हम तो उस को महजूब कर चुके हैं
ऐ मीर, तुम ज़िद की वजह क्या जानती हो? हमने उसे सौ बार शर्मिंदा किया है।
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