ग़ज़ल
क्या बुलबुल असीर है बे-बाल-ओ-पर कि हम
क्या बुलबुल असीर है बे-बाल-ओ-पर कि हम
यह ग़ज़ल एक नज़्म की तरह है जो प्रेम और वियोग के गहरे भावों को व्यक्त करती है। शायर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए प्रकृति के उपमानों का प्रयोग करता है, जिसमें बुलबुल, गुल और शबनम जैसे बिम्ब शामिल हैं। इसमें जीवन के संघर्षों और प्रेम की जटिलता पर विचार किया गया है, जो एक गहन भावनात्मक यात्रा का वर्णन करता है।
गीत सुनें
1
क्या बुलबुल असीर है बे-बाल-ओ-पर कि हम
गुल कब रखे है टुकड़े जिगर इस क़दर कि हम
क्या बुलबुल (चहकना) का कैदखाना है बिना पंख और परों का कि हम, या हमने अपने दिल के टुकड़े इतने कर दिए हैं कि गुलाब भी उन्हें एक साथ नहीं रख सकता?
2
ख़ुर्शीद सुब्ह निकले है इस नूर से कि तो
शबनम गिरह में रखती है ये चश्म-ए-तर कि हम
हे सूरज, तुम इस चमक से निकले हो कि यह आंसू भरी आँख इसे ओस की बूंद में रखती है।
3
जीते हैं तो दिखा देंगे दावा-ए-अंदलीब
गुल बिन ख़िज़ाँ में अब के वो रहती है मर कि हम
अगर हम जीवित रहे, तो अपनी बाग़ जैसी सुंदरता का दावा दिखा देंगे; लेकिन अभी तो फूल पतझड़ में है, और हम मर चुके हैं।
4
ये तेग़ है ये तश्त है ये हम हैं कुश्तनी
खेले है कौन ऐसी तरह जान पर कि हम
यह शराब है, यह प्याला है, और यह हम हैं कुश्ती लड़ने वाले; किसने जान पर इस तरह से खेल खेला?
5
तलवारें तुम लगाते हो हम हैंगे दम-ब-ख़ुद
दुनिया में ये करे है कोई दरगुज़र कि हम
तुम तलवारें लहराते हो, लेकिन हम स्वयं दम तोड़ देंगे; इस दुनिया में, यदि कोई भी हमारे पास से गुज़र जाए,
6
इस जुस्तुजू में और ख़राबी तो क्या कहें
इतनी नहीं हुई है सबा दर-ब-दर कि हम
इस तड़प में और मुसीबतें क्या कहना, इतनी नहीं हुई है बसंत हर दरवाज़े पर कि हम।
7
जब जा फँसा कहीं तो हमें याँ हुई ख़बर
रखता है कौन दिल तिरी इतनी ख़बर कि हम
जब मैं कहीं फँस जाऊँ, तो यहाँ कोई खबर कौन रखेगा? कौन दिल की तेरी इतनी खबर रखता है कि हम।
8
जीते हैं और रोते हैं लख़्त-ए-जिगर है 'मीर'
करते सुना है यूँ कोई क़ीमा जिगर कि हम
जीते हैं और रोते हैं, यह दिल का ग़म है, ऐ मीर। मैंने किसी को दिल के बारे में यूँ कहते सुना है कि हम।
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