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इस जुस्तुजू में और ख़राबी तो क्या कहें
इतनी नहीं हुई है सबा दर-ब-दर कि हम

In this confusion, what more trouble can we speak of, It is not that spring has come to every doorstep for us.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

इस तड़प में और मुसीबतें क्या कहना, इतनी नहीं हुई है बसंत हर दरवाज़े पर कि हम।

विस्तार

यह शेर गहरे और लंबे समय तक चले आ रहे दर्द को बयां करता है। शायर कहते हैं कि शिकायत करना कि और क्या मुसीबत है, व्यर्थ है, क्योंकि तकलीफें पहले से ही बहुत ज़्यादा हैं। 'सबा' (हवा) का ज़िक्र यह बताता है कि दुःख की एक हल्की सी लहर भी सहना मुश्किल है। यह भावनात्मक सहनशीलता की सीमा को छूने का एक बहुत ही गहरा एहसास है।

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