ग़ज़ल
क्या करूँ शरह ख़स्ता-जानी की
क्या करूँ शरह ख़स्ता-जानी की
यह ग़ज़ल जीवन की नश्वरता और प्रेम की पीड़ा को दर्शाती है। शायर कहता है कि वह मरने-मरने का अनुभव कर चुका है, लेकिन उसकी उदास बातें किसी काम की नहीं हैं। वह कहता है कि सब को जाना है, लेकिन एक तेरी जवानी की सब्र (धैर्य) सबसे बड़ी चुनौती है।
गीत सुनें
1
क्या करूँ शरह ख़स्ता-जानी की
मैं ने मर मर के ज़िंदगानी की
क्या करूँ शरह ख़स्ता-जानी की, मैं ने मर मर के ज़िंदगानी की।
2
हाल-ए-बद गुफ़्तनी नहीं मेरा
तुम ने पूछा तो मेहरबानी की
हाल-ए-बद गुफ़्तनी नहीं मेरा, तुम ने पूछा तो मेहरबानी की। इसका शाब्दिक अर्थ है कि मेरी हालत सामान्य बातचीत के लिए नहीं है; आपने पूछा, तो यह मेरे लिए एक कृपा है।
3
सब को जाना है यूँ तो पर ऐ सब्र
आती है इक तिरी जवानी की
सबको जाना है यूँ तो, पर ऐ सब्र, आती है इक तेरी जवानी की। (अर्थ: यद्यपि सबको कहीं जाना है, किंतु हे सब्र, तेरी जवानी का आगमन होता है।)
4
तिश्ना-लब मर गए तिरे आशिक़
न मिली एक बूँद पानी की
मेरे प्यासे होंठ तेरे आशिक़ मर गए, ऐ प्रिय, क्योंकि पानी की एक बूँद भी नहीं मिली।
5
बैत-बहसी समझ के कर बुलबुल
धूम है मेरी ख़ुश-ज़बानी की
बुलबुल ने, समझदारी से बात करते हुए कहा, 'मेरी मीठी बातें एक बड़ा नज़ारा हैं।'
6
जिस से खोई थी नींद 'मीर' ने कल
इब्तिदा फिर वही कहानी की
जिस चीज से 'मीर' ने कल अपनी नींद खोई थी, उससे ही आज फिर कहानी शुरू हो गई।
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