क्या करूँ शरह ख़स्ता-जानी की — मीर तक़ी मीर
क्या करूँ शरह ख़स्ता-जानी की
मैं ने मर मर के ज़िंदगानी की
“What should I do with the tenderness of my soul? I have lived my life by dying over and over.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
क्या करूँ शरह ख़स्ता-जानी की, मैं ने मर मर के ज़िंदगानी की।
विस्तार
यह शेर जीवन और मृत्यु के रिश्ते पर एक गहरा विचार है। शायर कहते हैं कि मौत की जो ललक है, वह उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। क्यों? क्योंकि उन्होंने अपनी ज़िन्दगी इतनी शिद्दत से जी है—जैसे कि वे बार-बार मर रहे हों। यह ज़िंदगी को पूरी गहराई और भावनात्मक समर्पण के साथ जीने का एहसास कराता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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