ग़ज़ल
किया मैं ने रो कर फ़िशार-ए-गरेबाँ
किया मैं ने रो कर फ़िशार-ए-गरेबाँ
यह ग़ज़ल विरह और बिछोह के गहरे दर्द को व्यक्त करती है, जिसमें शायर अपने टूटे हुए और अकेलेपन से भरे दिल का वर्णन करता है। वह अपने प्रेमी के नज़दीकी और प्रेम की यादों में डूबा हुआ है, और बार-बार उस दर्द को महसूस करता है जो दूरियों ने पैदा किया है।
गीत सुनें
1
किया मैं ने रो कर फ़िशार-ए-गरेबाँ
रग-ए-अब्र था तार-तार-ए-गरेबाँ
रोकर मैंने परदेसी के दिल का दबाव (फ़िशार) तोड़ा, और परदेसी के मन के whim से बादल की नस (रग) तार-तार हो गई।
2
कहीं दस्त-ए-चालाक नाख़ुन न लागे
कि सीना है क़ुर्ब-ओ-जवार-ए-गरेबाँ
कहीं चालाक नाखूनों का हाथ न लगे, कि सीना है परदेस में क़ुर्बत और जवार-ए-गरेबाँ का।
3
निशाँ अश्क-ए-ख़ूनीं के उड़ते चले हैं
ख़िज़ाँ हो चली है बहार-ए-गरेबाँ
खून के आँसुओं के निशान उड़ते चले गए हैं, और जहाँ कभी बहार थी, वहाँ अब पतझड़ आ गया है।
4
जुनूँ तेरी मिन्नत है मुझ पर कि तू ने
न रक्खा मिरे सर पे बार-ए-गरेबाँ
तेरे जुनून और मिन्नत पर मेरा इतना विश्वास है कि तूने मेरे सिर पर परदेसियों का बोझ नहीं डाला।
5
ज़ियारत करूँ दिल से ख़स्ता-जिगर की
कहाँ होगी यारब मज़ार-ए-गरेबाँ
दिल से ख़स्ता-जिगर की ज़ियारत करूँ, तो यारब का मज़ार-ए-गरेबाँ कहाँ होगा।
6
कहीं जाए ये दौर-ए-दामन भी जल्दी
कि आख़िर हुआ रोज़गार-ए-गरेबाँ
शायर कहता है कि यह साथ का दौर भी जल्दी गुज़र जाएगा, क्योंकि आख़िरकार परदेस में रोज़गार शुरू हो गया है।
7
फिरूँ 'मीर' उर्यां न दामन का ग़म हो
न बाक़ी रहे ख़ार-ख़ार-ए-गरेबाँ
मीर, हे शायर, उर्यां का दामन का ग़म न हो, और न ही गरेबाँ की ख़ार-ख़ार रहे।
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