कहीं दस्त-ए-चालाक नाख़ुन न लागे — मीर तक़ी मीर

कहीं दस्त-ए-चालाक नाख़ुन न लागे कि सीना है क़ुर्ब-ओ-जवार-ए-गरेबाँ

“Lest the clever fingernails touch, This chest, which is the closeness and sorrow of the stranger.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

कहीं चालाक नाखूनों का हाथ न लगे, कि सीना है परदेस में क़ुर्बत और जवार-ए-गरेबाँ का।

विस्तार

मिर्ज़ा तक़ी मीर ने यहाँ एक अनोखी बेचैनी को बयां किया है। शायर को शारीरिक चोट का डर नहीं है—न किसी चालाक हाथ का, न किसी नुकीले नाखून का। उनका डर कहीं और है। उनका डर है उस अपरिचित जगह की क़ुर्बत का, उस नज़दीकी का। यह शेर बताता है कि आशिक़ के लिए सबसे बड़ा दर्द चोट नहीं, बल्कि महबूब की मौजूदगी से पैदा होने वाला वो भावनात्मक माहौल होता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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