ग़ज़ल
ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा
ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा
यह ग़ज़ल बताती है कि जब तक साँस चल रही है, गम का एहसास बना रहता है। यह बताती है कि महबूब का हुस्न भले ही धोखा देने वाला हो, लेकिन दिल में एक गहरा दर्द और गम हमेशा मौजूद रहता है।
गीत सुनें
1
ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा
दिल के जाने का निहायत ग़म रहा
जब तक साँस में साँस थी, तब तक ग़म रहा, दिल के जाने का निहायत ग़म रहा।
2
हुस्न था तेरा बहुत आलम-फ़रेब
ख़त के आने पर भी इक आलम रहा
तुम्हारा हुस्न बहुत बड़ा भ्रम था, ऐ आलम-फ़रेब; ख़त के आने पर भी एक आलम बाकी रहा।
3
दिल न पहुँचा गोशा-ए-दामाँ तलक
क़तरा-ए-ख़ूँ था मिज़ा पर जम रहा
मेरा दिल आपके आँचल के कोने तक नहीं पहुँचा, और मेरे मिज़ाज पर खून की एक बूँद जम रही थी।
4
सुनते हैं लैला के ख़ेमे को सियाह
उस में मजनूँ का मगर मातम रहा
हम लैला के तम्बू को श्याम सुनते हैं, मगर उसमें मजनूँ का मातम है।
5
जामा-ए-एहराम-ए-ज़ाहिद पर न जा
था हरम में लेक ना-महरम रहा
शायर कह रहा है कि जामा-ए-एहराम-ए-ज़ाहिद पर मत जाना, क्योंकि हरम में भी व्यक्ति पवित्र नहीं रह पाता।
6
ज़ुल्फ़ें खोलीं तो तू टुक आया नज़र
उम्र भर याँ काम-ए-दिल बरहम रहा
जब मैंने अपने बाल खोलकर देखे, तो मेरी नज़र तुम पर अटक गई; मेरे दिल की इच्छा जीवन भर अधूरी रही।
7
उस के लब से तल्ख़ हम सुनते रहे
अपने हक़ में आब-ए-हैवाँ सम रहा
उसके होंठों से कड़वा सुनना जारी रखा, जैसे हमारे अधिकार के लिए जंगली जानवरों का पानी था।
8
मेरे रोने की हक़ीक़त जिस में थी
एक मुद्दत तक वो काग़ज़ नम रहा
मेरे रोने की हक़ीक़त उसी काग़ज़ में थी, जो एक लंबे समय तक नम रहा।
9
सुब्ह-ए-पीरी शाम होने आई 'मीर'
तू न चेता याँ बहुत दिन कम रहा
सुब्ह-ए-पीरी शाम होने आई, ऐ मीर। तू न चेता याँ बहुत दिन कम रहा। (अर्थात्, जब संत स्त्री का सुबह का समय शाम जैसा हो गया, तब भी हे मीर, तुमने चेतावनी नहीं दी और बहुत दिन बीत गए।)
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