ग़ज़ल

आरज़ूएँ हज़ार रखते हैं

आरज़ूएँ हज़ार रखते हैं

यह ग़ज़ल बताती है कि भले ही हमारे पास हज़ारों ख्वाहिशें हों, फिर भी हम दिल को बेक़रार और कम-हौसला रखते हैं। हम केवल इनायत के मूरिद नहीं हैं, बल्कि आपसे प्यार भी करते हैं। हम केवल नाम के यार नहीं हैं, बल्कि निगाह और वादे से भी प्रेम करते हैं।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
आरज़ूएँ हज़ार रखते हैं तो भी हम दिल को मार रखते हैं
अर्थात, भले ही हमारे पास हज़ार इच्छाएँ हों, फिर भी हम अपने दिल को काबू में रखते हैं।
2
बर्क़ कम-हौसला है हम भी तो दिलक-ए-बे-क़रार रखते हैं
बर्क़ (शायर) कम-हौसला है हम भी तो, दिलक-ए-बे-क़रार रखते हैं। इसका अर्थ है कि भले ही मेरा साहस कम लगे, लेकिन मेरे पास एक ऐसा दिल है जो कभी शांत नहीं रहता।
3
ग़ैर ही मूरिद-ए-इनायत है हम भी तो तुम से प्यार रखते हैं
शायर कह रहा है कि इनायत का स्रोत कोई और नहीं, लेकिन वह स्वयं भी आपसे प्रेम करता है।
4
न निगह ने पयाम ने वा'दा नाम को हम भी यार रखते हैं
न नज़रों ने, न पैगाम ने, न वादे ने, हम भी नाम को यार रखते हैं।
5
हम से ख़ुश-ज़मज़मा कहाँ यूँ तो लब ओ लहजा हज़ार रखते हैं
हमसे इतना खुश-ज़मज़मा कहाँ, जब हमारे पास हज़ारों लब और लहजे हैं।
6
चोट्टे दिल के हैं बुताँ मशहूर बस यही ए'तिबार रखते हैं
चोट्टे दिल वाले बुताँ मशहूर हैं, और वे बस यही एक विश्वास बनाए रखते हैं।
7
फिर भी करते हैं 'मीर' साहब इश्क़ हैं जवाँ इख़्तियार रखते हैं
फिर भी मीर साहब इश्क़ करते हैं क्योंकि वे अभी भी जवानी का जोश और उत्साह बनाए हुए हैं।
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