ग़ज़ल
कबीर 431-440
کبیر 431-440
कबीर की यह रचना गुरु के असाधारण महत्व को दर्शाती है, जहाँ गुरु के ज्ञान को उस निर्मल जल के समान बताया गया है जो शिष्य के मन से जन्म-जन्म के मैल को धो डालता है। यह गुरु की परिवर्तनकारी शक्ति पर जोर देती है, उन्हें पारस पत्थर से भी श्रेष्ठ मानती है क्योंकि गुरु शिष्य को संत बना देते हैं। कबीर कहते हैं कि गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले ही आवागमन के बंधन से मुक्त होते हैं।
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1
कुमति कीच चेला भरा , गुरु ज्ञान जल होय। जनम-जनम का मोरचा , पल में डारे धोय॥ 434॥
कुमति से भरा चेला, गुरु के ज्ञान के जल में डूब रहा है। जो पंख कई जन्मों में फैले थे, वे पल भर में धुल जाते हैं।
2
गुरु पारस को अन्तरो , जानत है सब सन्त। वह लोहा कंचन करे , ये करि लेय महन्त॥ 435॥
सभी संतों को यह ज्ञान है कि गुरु ही असली रत्न हैं। वे लोहे को सोना बना सकते हैं, हे महन्त।
3
गुरु की आज्ञा आवै , गुरु की आज्ञा जाय। कहैं कबीर सो सन्त हैं , आवागमन नशाय॥ 436॥
गुरु का आदेश आता है और गुरु का आदेश चला जाता है। कबीर कहते हैं कि सच्चे संत वे हैं जो आने-जाने के बंधनों से मुक्त हैं।
4
जो गुरु बसै बनारसी , सीष समुन्दर तीर। एक पलक बिसरे नहीं , जो गुण होय शरीर॥ 437॥
जो बनारस में बसता है, जो चेतना के सागर के किनारे रहता है, वह शरीर में स्थित दिव्य गुण को कभी नहीं भूलता।
5
गुरु समान दाता नहीं , याचक सीष समान। तीन लोक की सम्पदा , सो गुरु दीन्ही दान॥ 438॥
गुरु के समान दाता कोई नहीं, जिसका सिर याचक जैसा हो। तीनों लोकों का धन भी गुरु दान में दे देते हैं।
6
गुरु कुम्हार सिष कुंभ है , गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै , बाहर बाहै चोट॥ 439॥
गुरु कुम्हार और शिष्य का घड़ा है; वह हर पल उसकी खामियों को दूर करता है। वह अंदर से सहारा देकर और बाहर से चोट देकर उसे आकार देता है।
7
गुरु को सिर राखिये , चलिये आज्ञा माहिं। कहैं कबीर ता दास को , तीन लोक भय नहिं॥ 440॥
गुरु को सिर पर रखो और उनकी आज्ञा का पालन करो। कबीर कहते हैं कि भक्त को तीनों लोकों का कोई भय नहीं होता।
8
लच्छ कोष जो गुरु बसै , दीजै सुरति पठाय। शब्द तुरी बसवार है , छिन आवै छिन जाय॥ 441॥
जहाँ गुरु लच्छ में बसते हैं, मुझे सीखने की बुद्धि प्रदान करें। वाणी (शब्द) हमेशा मौजूद रहती है, यह पल-पल आती और चली जाती है।
9
गुरु मूरति गति चन्द्रमा , सेवक नैन चकोर। आठ पहर निरखता रहे , गुरु मूरति की ओर॥ 442॥
गुरु की मूर्ति चंद्रमा के समान है, और सेवक की आँखें चकोर पक्षी जैसी हैं। वे आठ पहर तक गुरु की मूर्ति की ओर देखते रहते हैं।
10
गुरु सों प्रीति निबाहिये , जेहि तत निबटै सन्त। प्रेम बिना ढिग दूर है , प्रेम निकट गुरु कन्त॥ 443॥
गुरु से प्रेम का संबंध बनाए रखना चाहिए, क्योंकि संत हमेशा गुरु से जुड़े रहते हैं। प्रेम के बिना निकटता दूर है, और प्रेम गुरु के निवास के समीप है।
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