गुरु सों प्रीति निबाहिये , जेहि तत निबटै सन्त। प्रेम बिना ढिग दूर है , प्रेम निकट गुरु कन्त॥

“Maintain friendship with the Guru; the saint is attached to him. Without love, the proximity is far; love is near the Guru's abode.”

— कबीर
अर्थ

गुरु से प्रेम का संबंध बनाए रखना चाहिए, क्योंकि संत हमेशा गुरु से जुड़े रहते हैं। प्रेम के बिना निकटता दूर है, और प्रेम गुरु के निवास के समीप है।

विस्तार

यह दोहा हमें गुरु के साथ गहरे प्रेम और मित्रता का महत्व समझाता है। कबीरदास जी कहते हैं कि बिना प्रेम के, चाहे हम गुरु के कितने भी करीब हों, असल में हम उनसे बहुत दूर होते हैं। जैसे प्रेम ही शिष्य को गुरु से बांधे रखता है, वैसे ही सच्चा प्रेम हमें गुरु के हृदय और उनकी कृपा के बिल्कुल पास ले आता है। यह दर्शाता है कि भौतिक दूरी मायने नहीं रखती, बल्कि हृदय का सच्चा लगाव ही सब कुछ है।

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