गुरु समान दाता नहीं , याचक सीष समान। तीन लोक की सम्पदा , सो गुरु दीन्ही दान॥

“A giver like a teacher, whose head is like a beggar. The wealth of three worlds, the teacher bestows as charity.”

— कबीर
अर्थ

गुरु के समान दाता कोई नहीं, जिसका सिर याचक जैसा हो। तीनों लोकों का धन भी गुरु दान में दे देते हैं।

विस्तार

कबीरदास जी इस दोहे में बताते हैं कि गुरु जैसा कोई सच्चा दाता नहीं होता। वे इतने निस्वार्थ होते हैं कि तीनों लोकों की सबसे बड़ी दौलत, यानी ज्ञान, ऐसे दान कर देते हैं जैसे उन्हें बदले में कुछ चाहिए ही न हो। यह 'याचक सीष समान' का भाव है – गुरु इतनी विनम्रता और सहजता से सब कुछ देते हैं मानो स्वयं कुछ मांग ही न रहे हों। उनका यह दान किसी भौतिक वस्तु का नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और जीवन की सच्चाई का होता है।

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