ग़ज़ल
कबीर 251-260
کبیر 251-260
यह गज़ल कबीर के परमात्मा से मिलन की तीव्र लालसा को व्यक्त करती है। इसमें आध्यात्मिक मार्ग की कठिनाई और ईश्वर से विरह की गहरी पीड़ा का वर्णन है, जहाँ कोई मंत्र या सांत्वना काम नहीं आती। भक्त अपने प्रिय हरि का दर्शन पाने के लिए अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपने शरीर का भी बलिदान करने को तत्पर है।
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1
लंबा मारग , दूरिधर , विकट पंथ , बहुमार। कहौ संतो , क्यूं पाइये , दुर्लभ हरि-दीदार॥ 252॥
हे संतों, यह मार्ग लंबा, दूर और विकट है, और इस पर बहुत बाधाएँ हैं; आप बताइए कि हम कभी दुर्लभ हरि-दीदार (भगवान के दर्शन) कैसे प्राप्त करेंगे।
2
बिरह-भुवगम तन बसै मंत्र न लागै कोइ। राम-बियोगी ना जिवै जिवै तो बौरा होइ॥ 253॥ यह तन जालों मसि करों , लिखों राम का नाउं। लेखणि करूं करंक की , लिखी-लिखी राम पठाउं॥ 254॥
इस तन में विरह के भाव बसे हैं, कोई भी मंत्र असर नहीं करता। जो राम से बिछुड़ा है, वह जी नहीं सकता और पागल हो जाता है। मैं इस शरीर को एक जालो (canvas) बनाना चाहता हूँ और इस पर राम का नाम लिखूंगा। मैं करंक (कमल) का नाम लिखकर और उसे सुनाकर राम की महिमा का वर्णन करूंगा।
3
अंदेसड़ा न भाजिसी , सदैसो कहियां। के हरि आयां भाजिसी , कैहरि ही पास गयां॥ 255॥
हे दोस्त, तुम नदी पार नहीं करोगे, हमेशा कहते रहते हो। कब हरि आए कि नदी पार करें? वे तो हरि के साथ ही पास चले गए।
4
इस तन का दीवा करौ , बाती मेल्यूं जीवउं। लोही सींचो तेल ज्यूं , कब मुख देख पठिउं॥ 256॥
अर्थात, मेरा यह शरीर एक दीपक है और मेरी आत्मा इसकी बाती। मैं लोहे की तरह तेल से सींचना चाहता हूँ और जब तक मेरा मुख देखना चाहते हैं, तब तक रहना चाहता हूँ।
5
अंषड़ियां झाईं पड़ी , पंथ निहारि-निहारि। जीभड़ियाँ छाला पड़या , राम पुकारि-पुकारि॥ 257॥
मेरे अंग घायल हो गए हैं, और मैं रास्ता देखते-देखते थक गया हूँ। मेरी जीभ पर छाले पड़ गए हैं, और मैं राम का नाम लेते-लेते थक गया हूँ।
6
सब रग तंत रबाब तन , बिरह बजावै नित्त। और न कोई सुणि सकै , कै साईं के चित्त॥ 258॥
हर नस और तार जैसे रबाब हो, जो हर समय विरह का संगीत बजाता है। लेकिन यह केवल साईं के हृदय के ही संगीत को सुन सकता है।
7
जो रोऊँ तो बल घटै , हँसो तो राम रिसाइ। मन ही माहिं बिसूरणा , ज्यूँ घुँण काठहिं खाइ॥ 259॥
अगर मैं रोऊँ तो मेरी शक्ति कम हो जाती है, और अगर मैं हँसुँ तो राम प्रसन्न होते हैं। मेरे मन में बेचैनी है, जैसे किसी आरी से डाली को काटा जा रहा हो।
8
कबीर हँसणाँ दूरि करि , करि रोवण सौ चित्त। बिन रोयां क्यूं पाइये , प्रेम पियारा मित्व॥ 260॥
कबीर कहते हैं कि दूर से हँसना और मन से रोना एक ही अवस्था है। बिना रोए प्रेम के प्यारे को कैसे पाया जा सकता है।
9
सुखिया सब संसार है , खावै और सोवे। दुखिया दास कबीर है , जागै अरु रौवे॥ 261॥
सारा संसार सुखी है, वह खाता और सोता है। लेकिन दास कबीर दुखी है, वह जागता और रोता है।
10
परबति परबति मैं फिरया , नैन गंवाए रोइ। सो बूटी पाऊँ नहीं , जातैं जीवनि होइ॥ 262॥
पहाड़ से पहाड़ मैं फिरता हूँ, आँसू बहाता हुआ। वह बूटी मुझे नहीं मिल पाएगी, मेरा जीवन निकल जाएगा।
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