“O mountain, mountain, I wander again, weeping, losing my eyes. I will not find that herb; my life departs.”
पहाड़ से पहाड़ मैं फिरता हूँ, आँसू बहाता हुआ। वह बूटी मुझे नहीं मिल पाएगी, मेरा जीवन निकल जाएगा।
वाह, क्या मार्मिक चित्र है! इस दोहे में कबीर दास जी हमें दिखाते हैं कि साधक पहाड़ों-पहाड़ों भटक रहा है, रोते-रोते उसकी आँखें भी थक चुकी हैं, पर उसे वो जीवनदायिनी बूटी नहीं मिल रही जिसकी तलाश में वो है। यह बूटी असल में आत्मज्ञान, सच्ची शांति या जीवन के गहरे अर्थ का प्रतीक हो सकती है, जो लाख कोशिशों के बाद भी हाथ नहीं आ रही। यह हमें समझाता है कि हमारी सारी कोशिशें कभी-कभी व्यर्थ भी हो सकती हैं और जीवन यूं ही निकलता चला जाता है, उस परम सत्य को पाए बिना।
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