कबीर हँसणाँ दूरि करि , करि रोवण सौ चित्त। बिन रोयां क्यूं पाइये , प्रेम पियारा मित्व॥

“Kabir, laughing from afar, and weeping with heart; without weeping, how can one find the beloved love?”

— कबीर
अर्थ

कबीर कहते हैं कि दूर से हँसना और मन से रोना एक ही अवस्था है। बिना रोए प्रेम के प्यारे को कैसे पाया जा सकता है।

विस्तार

कबीर दास जी कहते हैं कि सच्ची प्रीति पाने के लिए दिखावटी खुशी को त्यागकर, अपने चित्त को करुणा और तड़प में डुबोना पड़ता है। वे समझाते हैं कि प्रेम ऐसे ही नहीं मिलता; प्रियतम की मीठी याद और उसकी चाहत में बहने वाले आँसू ही हमें उस गहरे प्रेम से जोड़ते हैं। यह रोना केवल दुख नहीं, बल्कि समर्पण और सच्ची भक्ति का प्रतीक है, जिसके बिना उस प्यारे मित्र को पाना असंभव है।

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