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सब रग तंत रबाब तन , बिरह बजावै नित्त। और न कोई सुणि सकै , कै साईं के चित्त॥ 258॥

The lute plays the body of every vein, always in separation's tune. But no one can hear, save Sai's own heart's sound.

कबीर
अर्थ

हर नस और तार जैसे रबाब हो, जो हर समय विरह का संगीत बजाता है। लेकिन यह केवल साईं के हृदय के ही संगीत को सुन सकता है।

विस्तार

कबीर जी यहाँ शरीर को एक रबाब (वीणा जैसा वाद्य) बताते हैं, जिसकी हर नस एक तार है। और इस रबाब पर विरह यानी परमात्मा से बिछड़ने का दर्द हर पल बज रहा है। यह एक ऐसी धुन है, जो इतनी निजी और गहरी है कि इसे कोई और सुन ही नहीं पाता। इस अनमोल विरह की धुन को सिर्फ साईं, यानी ईश्वर ही अपने हृदय से सुन सकते हैं और समझते हैं।

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