ग़ज़ल

यादश-ब-ख़ैर जब वो तसव्वुर में आ गया

یادش بخیر جب وہ تصور میں آ گیا
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 7 shers· radif: गया

यह ग़ज़ल महबूब की याद और तसव्वुर के जादुई असर को बयां करती है, जिसके आते ही शेर, शबाब और हुस्न का दरिया उमड़ पड़ता है। इसमें सच्चे इश्क़ के उस उरूज का ज़िक्र है, जहाँ वह अपने असल मक़ाम पर पहुँचकर दोनों जहानों पर छा जाता है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
यादश-ब-ख़ैर जब वो तसव्वुर में आ गया शे'र ओ शबाब ओ हुस्न का दरिया बहा गया
उनकी याद सलामत रहे, जब भी वह मेरी कल्पना में आए तो शायरी, जवानी और हुस्न का एक दरिया बहा गए।
2
जब इश्क़ अपने मरकज़-ए-असली पे आ गया ख़ुद बन गया हसीन दो आलम पे छा गया
जब प्रेम अपने मूल केंद्र पर पहुँच गया, तो वह स्वयं सौंदर्य बन गया और दोनों जहानों पर छा गया।
3
जो दिल का राज़ था उसे कुछ दिल ही पा गया वो कर सके बयाँ न हमीं से कहा गया
दिल का जो राज़ था, उसे बस दिल ही समझ सका; न वे उसे लफ़्ज़ों में बयां कर पाए और न हमसे ही कुछ कहते बना।
4
नासेह फ़साना अपना हँसी में उड़ा गया ख़ुश-फ़िक्र था कि साफ़ ये पहलू बचा गया
सलाहकार ने मेरी कहानी को हँसी में टाल दिया; वह बहुत चालाक था कि बड़ी सफ़ाई से इस पहलू से बच निकला।
5
अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल हम वो नहीं कि जिन को ज़माना बना गया
दिल वाले लोग अपना ज़माना ख़ुद बनाते हैं; हम उन लोगों में से नहीं हैं जिन्हें ज़माने या हालात ने गढ़ा हो।
6
दिल बन गया निगाह निगह बन गई ज़बाँ आज इक सुकूत-ए-शौक़ क़यामत ही ढा गया
दिल आँख बन गया और आँखें ज़बान बन गईं; आज चाहत और तड़प की एक ख़ामोशी ने तो क़यामत ही बरपा कर दी।
7
मेरा कमाल-ए-शेर बस इतना है ऐ 'जिगर' वो मुझ पे छा गए मैं ज़माने पे छा गया
ऐ जिगर, मेरी शायरी का कमाल बस इतना ही है कि महबूब मुझ पर छा गया और मैं पूरी दुनिया पर छा गया।
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