ग़ज़ल
वो जो रूठें यूँ मनाना चाहिए
وہ جو روٹھیں یوں منانا چاہیئے
यह ग़ज़ल प्रेम में चरम समर्पण और बलिदान के गहरे जज़्बे को बयां करती है। शायर के अनुसार महबूब की नाराज़गी दूर करने के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा देना और ख़ंजर के नीचे भी मुस्कुराते रहना ही सच्चे इश्क़ की पहचान है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
वो जो रूठें यूँ मनाना चाहिए
ज़िंदगी से रूठ जाना चाहिए
यदि महबूब रूठ जाए तो उसे इस तरह मनाना चाहिए कि इंसान अपनी ज़िंदगी से ही रूठ जाए।
2
हिम्मत-ए-क़ातिल बढ़ाना चाहिए
ज़ेर-ए-ख़ंजर मुस्कुराना चाहिए
क़ातिल के हौसले को बढ़ाना चाहिए और ख़ंजर के नीचे भी मुस्कुराना चाहिए।
3
ज़िंदगी है नाम जोहद ओ जंग का
मौत क्या है भूल जाना चाहिए
ज़िंदगी निरंतर संघर्ष और कोशिश का ही नाम है, और इंसान को यह भूल जाना चाहिए कि मौत क्या चीज़ है।
4
है इन्हीं धोकों से दिल की ज़िंदगी
जो हसीं धोका हो खाना चाहिए
दिल का जीवन इन्हीं धोखों के सहारे कायम है; अगर कोई धोखा खूबसूरत हो, तो उसे खुशी-खुशी खा लेना चाहिए।
5
लज़्ज़तें हैं दुश्मन-ए-औज-ए-कमाल
कुल्फ़तों से जी लगाना चाहिए
सांसारिक सुख और ऐश-ओ-आराम इंसान को बुलंदी या पूर्णता के शिखर तक पहुँचने से रोकते हैं, इसलिए इंसान को कठिनाइयों और तकलीफ़ों से दिल लगाना चाहिए।
6
उन से मिलने को तो क्या कहिए 'जिगर'
ख़ुद से मिलने को ज़माना चाहिए
ऐ 'जिगर', महबूब से मिलने की तो बात ही क्या, यहाँ तो खुद अपने आप से मिलने और रूबरू होने में ही एक ज़माना लग जाता है।
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