ग़ज़ल
यूँ हाथ नहीं आता वो गौहर-ए-यक-दाना
यूँ हाथ नहीं आता वो गौहर-ए-यक-दाना
यह ग़ज़ल एक अनमोल, अद्वितीय रत्न की तुलना में किसी विशेष चीज़ की अपार महत्ता और आकर्षण को दर्शाती है। इसमें विभिन्न महान व्यक्तित्वों और अवधारणाओं (जैसे आज़ादी, क़लंदर, फ़राबी, रूमी, अक़्ल, इश्क़ आदि) के गुणों को याद करते हुए, एक गहरे भावनात्मक या आध्यात्मिक आकर्षण की खोज की गई है। यह कविता विभिन्न शैलियों और विचारों के मिश्रण से एक व्यापक और गहन अनुभव का वर्णन करती है।
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1
यूँ हाथ नहीं आता वो गौहर-ए-यक-दाना
यक-रंगी ओ आज़ादी ऐ हिम्मत-ए-मर्दाना
वह एक दाने जैसा रत्न मेरे हाथ नहीं आता; हे एक रंग वाली आज़ादी, हे पुरुष का साहस।
2
या संजर ओ तुग़रल का आईन-ए-जहाँगीरी
या मर्द-ए-क़लंदर के अंदाज़-ए-मुलूकाना
हे संजर, जहाँगीरी की दुनिया का आईना, और कवलंदर के मर्द के अंदाज़ में रानी जैसा।
3
या हैरत-ए-'फ़राबी' या ताब-ओ-तब-ए-'रूमी'
या फ़िक्र-ए-हकीमाना या जज़्ब-ए-कलीमाना
क्या यह 'फ़राबी' का आश्चर्य है, या 'रूमी' का धैर्य? क्या यह दार्शनिकों का विचार है, या कवियों का आकर्षण?
4
या अक़्ल की रूबाही या इश्क़-ए-यदुल-लाही
या हीला-ए-अफ़रंगी या हमला-ए-तुरकाना
क्या यह बुद्धि का आकर्षण है या ईश्वर का प्रेम, या यह विदेशी का तरीका है या मोर का हमला।
5
या शर-ए-मुसलमानी या दैर की दरबानी
या नारा-ए-मस्ताना काबा हो कि बुत-ख़ाना
या मुसलमानी शर या दैर की दरबानी, या मस्ताना नारा काबा हो या बुत-ख़ाना।
6
मीरी में फ़क़ीरी में शाही में ग़ुलामी में
कुछ काम नहीं बनता बे-जुरअत-ए-रिंदाना
मेरी में फ़क़ीरी में शाही में ग़ुलामी में, कुछ काम नहीं बनता बे-जुरअत-ए-रिंदाना। (अर्थात, मेरी (मेरा) अवस्था, फ़कीरी (संन्यासी जीवन) या शाही (शाही जीवन) या ग़ुलामी (गुलाम जीवन) में, कुछ भी काम नहीं आता बे-जुरअत-ए-रिंदाना (यानी, अकेले या बेपरवाह साहस) के बिना।)
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