या हैरत-ए-'फ़राबी' या ताब-ओ-तब-ए-'रूमी'
या फ़िक्र-ए-हकीमाना या जज़्ब-ए-कलीमाना
“Is this the astonishment of 'Farabi', or the endurance of 'Rumi'? Is this the thought of the philosophers, or the pull of the poetic?”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
क्या यह 'फ़राबी' का आश्चर्य है, या 'रूमी' का धैर्य? क्या यह दार्शनिकों का विचार है, या कवियों का आकर्षण?
विस्तार
यह शेर, यह एक बहुत गहरा सवाल उठाता है... कि क्या हमारी कोई भी गहरी भावना, क्या कोई भी अहसास, सिर्फ़ किताबों या तर्कों से आता है? शायर पूछते हैं कि क्या यह 'फ़राबी' जैसे दार्शनिक विचारों का नतीजा है, या 'रूमी' जैसे रूहानी जुनून का? यह मानव मन की उस उलझन को बयां करता है, जहां तर्क और जज़्बात आपस में टकराते हैं।
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