ग़ज़ल
ये पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुब्ह-गाही
ये पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुब्ह-गाही
ये ग़ज़ल सुबह की हवा के संदेश की तरह है, जिसमें सच्चे ज्ञान और महफ़िल के रहस्यों का वर्णन है। यह बताती है कि आत्म-ज्ञान ही वास्तविक प्रतिष्ठा है, और जीवन में मार्गदर्शन न मिलने पर भी, कला और वाणी में अभी भी सीखने की गुंजाइश है।
गीत सुनें
1
ये पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुब्ह-गाही
कि ख़ुदी के आरिफ़ों का है मक़ाम पादशाही
यह संदेश मुझे सुबह की हवा ने दिया है कि स्वयं के ज्ञानियों का स्थान एक शक्तिशाली राज्य है।
2
तिरी ज़िंदगी इसी से तिरी आबरू इसी से
जो रही ख़ुदी तो शाही न रही तो रू-सियाही
तुम्हारी ज़िंदगी और आबरू इसी से है; जो ख़ुदी रही तो शाही रही, और जो ख़ुदी न रही तो रू-सियाही।
3
न दिया निशान-ए-मंज़िल मुझे ऐ हकीम तू ने
मुझे क्या गिला हो तुझ से तू न रह-नशीं न राही
हे वैद्य, आपने मुझे मंज़िल का निशान नहीं दिया; मुझे तुमसे क्या शिकायत है, तुम न रहने वाले हो न राहगीर।
4
मिरे हल्क़ा-ए-सुख़न में अभी ज़ेर-ए-तर्बियत हैं
वो गदा कि जानते हैं रह-ओ-रस्म-ए-कज-कुलाही
मेरे काव्य-समूह में अभी भी कुछ ऐसे लोग हैं जो प्रशिक्षण में हैं, वे मूर्ख के रीति-रिवाजों और रिवाजों को जानते हैं।
5
ये मुआ'मले हैं नाज़ुक जो तिरी रज़ा हो तू कर
कि मुझे तो ख़ुश न आया ये तरिक़-ए-ख़ानक़ाही
ये मामले नाज़ुक हैं, जो तुम्हारी रज़ा हो, तुम कर। कि मुझे तो ख़ुश न आया ये तरीक़े-ख़ानक़ाही।
6
तू हुमा का है शिकारी अभी इब्तिदा है तेरी
नहीं मस्लहत से ख़ाली ये जहान-ए-मुर्ग़-ओ-माही
तुम हुमा के शिकारी हो, तुम्हारी अभी शुरुआत है; यह मुर्ग और माही का संसार साजिशों से खाली नहीं है।
7
तू अरब हो या अजम हो तिरा ला इलाह इल्ला
लुग़त-ए-ग़रीब जब तक तिरा दिल न दे गवाही
चाहे तुम अरब हो या अज़म, तुम्हारा दिल 'ला इलाह इल्ला' की गवाही तब तक नहीं देगा जब तक तुम इसे न कहो।
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