ग़ज़ल

ने मोहरा बाक़ी ने मोहरा-बाज़ी

ने मोहरा बाक़ी ने मोहरा-बाज़ी

यह ग़ज़ल जीवन की अनिश्चित और दाँव-पेंच भरी प्रकृति का वर्णन करती है, जहाँ जीत और हार दोनों ही क्षणभंगुर हैं। यह बताती है कि झूठी शान और दिखावे के पीछे सच्चाई छिपी है, और हर किसी को अपनी वास्तविकता का सामना करना होगा।

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1
ने मोहरा बाक़ी ने मोहरा-बाज़ी जीता है 'रूमी' हारा है 'राज़ी'
ने मोहरा बाक़ी ने मोहरा-बाज़ी जीता है 'रूमी' हारा है 'राज़ी' का शाब्दिक अर्थ है कि बाक़ी (शेष) ने मोहरा-बाज़ी (प्यादों का खेल) जीत लिया है, और 'रूमी' (एक व्यक्ति) 'राज़ी' (दूसरे व्यक्ति) से हार गया है।
2
रौशन है जाम-ए-जमशेद अब तक शाही नहीं है बे-शीशा-बाज़ी
जमशेद का जाम अभी भी रोशन है, लेकिन खाली खेल का कला अब शाही नहीं रही।
3
दिल है मुसलमाँ मेरा तेरा तू भी नमाज़ी मैं भी नमाज़ी
मेरा दिल मुसलमाँ है, न तुम्हारा न मेरा। तुम भी नमाज़ी नहीं हो और मैं भी नमाज़ी नहीं हूँ।
4
मैं जानता हूँ अंजाम उस का जिस मारके में मुल्ला हों ग़ाज़ी
मैं जानता हूँ उस व्यक्ति का अंजाम, जो मुल्ला को ग़ाज़ी के रूप में मारता है।
5
तुर्की भी शीरीं ताज़ी भी शीरीं हर्फ़-ए-मोहब्बत तुर्की ताज़ी
तुर्की और ताज़ी दोनों ही मीठे हैं, पर मोहब्बत का हरफ़ न तुर्की है न ताज़ी।
6
आज़र का पेशा ख़ारा-तराशी कार-ए-ख़लीलाँ ख़ारा-गुदाज़ी
आज़र का पेशा ख़ारा-तराशी है, और ख़लीलाँ का काम ख़ारा-गुदाज़ी है।
7
तू ज़िंदगी है पाएँदगी है बाक़ी है जो कुछ सब ख़ाक-बाज़ी
तुम ज़िंदगी हो, तुम ही जीवन का धागा हो। बाकी सब कुछ बस धूल-मिट्टी और भ्रम है।
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