ग़ज़ल

मिटा दिया मिरे साक़ी ने आलम-ए-मन-ओ-तू

मिटा दिया मिरे साक़ी ने आलम-ए-मन-ओ-तू

इस ग़ज़ल में, शायर अपने साक़ी (साक़ी) से कहता है कि उसने मन और अस्तित्व की दुनिया मिटा दी है, और उसे ला इलाहा इल्लाहू के मदहोशी का मय पिलाया है। वह कहता है कि न मय, न शायरी, न साक़ी, और न ही शोर-ए-चंग-ओ-रबाब (संगीत का शोर) उसे शांति देता है। अंत में, वह सूफियों के ख़ाली कदू (जगह) की शान का वर्णन करता है।

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लिपि व अर्थ
1
मिटा दिया मिरे साक़ी ने आलम-ए-मन-ओ-तू पिला के मुझ को मय-ए-ला-इलाहा-इल्ला-हू
मेरे साक़ी ने मेरे मन और तेरे मन का आलम मिटा दिया, और मुझे 'ला इलाहा इल्ला मुहम्मद' (या 'ला इलाहा इल्ला हु') का मय पिला दिया।
2
न मय न शे'र न साक़ी न शोर-ए-चंग-ओ-रबाब सुकूत-ए-कोह ओ लब-ए-जू व लाला-ए-ख़ुद-रू
न प्रियतमा, न कवि, न जाम पिलाने वाला, न तान और रबाब का शोर—यह पहाड़ की शांति है, या गुलाब के होंठ हैं, या स्वयं का फूल।
3
गदा-ए-मय-कदा की शान-ए-बे-नियाज़ी देख पहुँच के चश्मा-ए-हैवाँ पे तोड़ता है सुबू
गदा-ए-मय-कदा की शान-ए-बे-नियाज़ी देखकर सुबू पशु के झरने पर उसे तोड़ देता है।
4
मिरा सबूचा ग़नीमत है इस ज़माने में कि ख़ानक़ाह में ख़ाली हैं सूफ़ियों के कदू
इस ज़माने में मेरा सौभाग्य है कि खानक़ाह में सूफ़ियों के कदू ख़ाली हैं।
5
मैं नौ-नियाज़ हूँ मुझ से हिजाब ही औला कि दिल से बढ़ के है मेरी निगाह बे-क़ाबू
मैं नौ-नियाज़ हूँ, और मुझ से हिजाब ही औला है; क्योंकि दिल से बढ़ के है मेरी निगाह बे-क़ाबू।
6
अगरचे बहर की मौजों में है मक़ाम इस का सफ़ा-ए-पाकी-ए-तीनत से है गुहर का वुज़ू
भले ही इसका स्थान समुद्र की लहरों में है, इसका शुद्धिकरण त्रिमूर्ति की पवित्रता से है।
7
जमील-तर हैं गुल ओ लाला फ़ैज़ से इस के निगाह-ए-शाइर-ए-रंगीं-नवा में है जादू
फूल और महबूब फ़ैज़ के शब्दों से सुगंधित हैं, क्योंकि शायर की रंगीन निगाहों में जादू है।
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