ग़ज़ल
ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी
ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी
यह ग़ज़ल शायर के मय-ख़ाने (शराबख़ाने) में बार-बार महफ़िल और मस्ती की तलब को व्यक्त करती है। शायर अपने मक़ाम (स्थिति) पर सवाल उठाते हुए साक़ी से बार-बार बादा और जाम माँगता है, और अंत में यह सवाल करता है कि क्या ये सब शौक़ और मस्ती का माहौल अब भी जायज़ है।
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1
ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी
हाथ आ जाए मुझे मेरा मक़ाम ऐ साक़ी
ला फिर एक बार वही मदहोश शराब और प्याला, ऐ साक़ी। मुझे मेरा ठिकाना लौटा दे, ऐ साक़ी।
2
तीन सौ साल से हैं हिन्द के मय-ख़ाने बंद
अब मुनासिब है तिरा फ़ैज़ हो आम ऐ साक़ी
तीन सौ साल से हिन्द के मय-ख़ाने बंद हैं। अब मुनासिब है कि ऐ साक़ी, तेरा फ़ैज़ आम हो जाए।
3
मेरी मीना-ए-ग़ज़ल में थी ज़रा सी बाक़ी
शेख़ कहता है कि है ये भी हराम ऐ साक़ी
मेरी ग़ज़ल की मीना में थोड़ी सी बची थी, लेकिन शेख कहते हैं कि यह भी हराम है, ऐ साक़ी।
4
शेर मर्दों से हुआ बेश-ए-तहक़ीक़ तही
रह गए सूफ़ी ओ मुल्ला के ग़ुलाम ऐ साक़ी
शेर का सच पुरुषों के सामने निराधार है; केवल सूफ़ी और मुल्ला ही साक़ी के गुलाम बने रहते हैं।
5
इश्क़ की तेग़-ए-जिगर-दार उड़ा ली किस ने
इल्म के हाथ में ख़ाली है नियाम ऐ साक़ी
इश्क़ की तेग़-ए-जिगर-दार उड़ा ली किस ने? ज्ञान के हाथ में तो खाली है नियाम ऐ साक़ी।
6
सीना रौशन हो तो है सोज़-ए-सुख़न ऐन-ए-हयात
हो न रौशन तो सुख़न मर्ग-ए-दवाम ऐ साक़ी
यदि सीना रोशन हो, तो यह जीवन का दर्पण है और वाणी का ज्वलनशील प्रेम है; और यदि यह रोशन न हो, तो वाणी ही साक़ी, स्थायी उपचार का मार्ग है।
7
तू मिरी रात को महताब से महरूम न रख
तिरे पैमाने में है माह-ए-तमाम ऐ साक़ी
तू मेरी रात को चाँद से महरूम न रख, तेरे प्याले में है चाँद-ए-तमाम ऐ साक़ी।
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