तू मिरी रात को महताब से महरूम न रख — अल्लामा इक़बाल

तू मिरी रात को महताब से महरूम न रख तिरे पैमाने में है माह-ए-तमाम ऐ साक़ी

“Do not deprive my night of the moon, O beloved; for in your cup resides the full moon, O cupbearer.”

— अल्लामा इक़बाल

अर्थ

तू मेरी रात को चाँद से महरूम न रख, तेरे प्याले में है चाँद-ए-तमाम ऐ साक़ी।

विस्तार

यह शेर इश्क़ की उस शिद्दत को बयान करता है, जब आशिक़ अपनी महबूब से कहता है कि मेरी रात को चाँदनी से मत महरूम करना। साक़ी से गुज़ारिश है कि तुम्हारे पैमाने में तो पूरा महीना भरा है! यह सिर्फ़ चाँदनी की बात नहीं है... बल्कि यह उस अटूट, कभी न ख़त्म होने वाले नूर की गुज़ारिश है, जो जीवन को रौशन रखे। एक अद्भुत नज़ारा है यह, जिसमें प्रेम और इल्तिज़ा दोनों शामिल हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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