ग़ज़ल

गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर

गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर

यह ग़ज़ल किसी के असाधारण रूप से आकर्षक व्यक्तित्व को और भी अधिक चमक और प्रभाव से अलंकृत करने की बात करती है। यह प्रेम और आकर्षण के विभिन्न रूपों का वर्णन करती है, जिसमें प्रेमी से अपेक्षा की जाती है कि वह या तो अपना प्रेम स्पष्ट करे या वक्ता को स्पष्ट करे।

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लिपि व अर्थ
1
गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर होश ओ ख़िरद शिकार कर क़ल्ब ओ नज़र शिकार कर
गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर, होश ओ ख़िरद शिकार कर क़ल्ब ओ नज़र शिकार कर। (अर्थात: जो केश पहले से ही शानदार हैं, उन्हें और भी शानदार बनाओ; बुद्धि और समझ से दिल और निगाह को शिकार बनाओ।)
2
इश्क़ भी हो हिजाब में हुस्न भी हो हिजाब में या तो ख़ुद आश्कार हो या मुझे आश्कार कर
चाहे इश्क़ हिजाब में हो या हुस्न हिजाब में, या तो ख़ुद प्रकट हो या मुझे प्रकट कर।
3
तू है मुहीत-ए-बे-कराँ मैं हूँ ज़रा सी आबजू या मुझे हम-कनार कर या मुझे बे-कनार कर
तुम हैं अथाह किनारों से भरा हुआ; मैं बस एक छोटी सी धारा हूँ। या तो मुझे किनारे से बाँध दो, या मुझे बे-किनारा कर दो।
4
मैं हूँ सदफ़ तो तेरे हाथ मेरे गुहर की आबरू मैं हूँ ख़ज़फ़ तो तू मुझे गौहर-ए-शाहवार कर
मैं अगर सीप (सदफ़) हूँ, तो मेरे हाथ तुम्हारे हैं, मेरे गहने के सौंदर्य हैं; और अगर मैं ज़मीन (ख़ज़फ़) हूँ, तो मुझे शाही गहने के शानदार रत्न बना दो।
5
नग़्मा-ए-नौ-बहार अगर मेरे नसीब में न हो उस दम-ए-नीम-सोज़ को ताइरक-ए-बहार कर
यदि नौ बहारों का नग़मा मेरे नसीब में न हो, तो इस अर्ध-ज्वलन (दोपहर) को बहार का मौसम बना दो।
6
बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर
बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ। कार-ए-जहाँ दराज़ है, अब मिरा इंतज़ार कर।
7
रोज़-ए-हिसाब जब मिरा पेश हो दफ़्तर-ए-अमल आप भी शर्मसार हो मुझ को भी शर्मसार कर
जब मेरा हिसाब का दिन कर्मों के दफ़्तर में पेश होगा, तो आप भी मुझे शर्मिंदा करें, जैसा आपने मुझे किया है।
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गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर | Sukhan AI