ग़ज़ल
किसी को दे के दिल कोई नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो
کسی کو دے کے دل کوئی نواسنجِ فغاں کیوں ہو
यह ग़ज़ल प्रेम के प्रति एक मोहभंग और विद्रोही दृष्टिकोण व्यक्त करती है। इसमें कवि दिल देने के बाद विलाप करने की निरर्थकता पर सवाल उठाता है, एक अटल महबूब के सामने आत्म-सम्मान पर ज़ोर देता है और विश्वासपात्र द्वारा किए गए विश्वासघात को अस्वीकार करता है। अंत में, यह वफ़ादारी और इश्क़ पर एक निंदक विचार प्रस्तुत करता है, महबूब के अधिकार को चुनौती देता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
किसी को दे के दिल कोई नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो
न हो जब दिल ही सीने में तो फिर मुँह में ज़बाँ क्यूँ हो
किसी को अपना दिल दे देने के बाद कोई क्यों शिकायत करे या रोए? जब सीने में दिल ही नहीं है, तो फिर मुंह में ज़बान क्यों होनी चाहिए?
2
वो अपनी ख़ू न छोड़ेंगे हम अपनी वज़्अ क्यूँ छोड़ें
सुबुक-सर बन के क्या पूछें कि हम से सरगिराँ क्यूँ हो
वे अपनी आदत नहीं छोड़ेंगे, तो हम अपनी गरिमा या तौर-तरीके क्यों छोड़ें? हमें तुच्छ बनकर यह नहीं पूछना चाहिए कि वे हमसे क्यों नाराज़ हैं या मुंह फेर रहे हैं।
3
किया ग़म-ख़्वार ने रुस्वा लगे आग इस मोहब्बत को
न लावे ताब जो ग़म की वो मेरा राज़-दाँ क्यूँ हो
मेरे हमदर्द ने मुझे बदनाम किया, ऐसी मोहब्बत को आग लग जाए। जो व्यक्ति दुःख सहने की शक्ति नहीं रखता, वह मेरा भेद जानने वाला क्यों हो?
4
वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ संग-दिल तेरा ही संग-ए-आस्ताँ क्यूँ हो
जब अंत में अपना सर फोड़ना ही तय है, तो कैसी वफ़ा और कैसा इश्क़? फिर, ऐ पत्थर दिल, मेरा सर सिर्फ़ तेरे ही दर पर क्यों फूटे?
5
क़फ़स में मुझ से रूदाद-ए-चमन कहते न डर हमदम
गिरी है जिस पे कल बिजली वो मेरा आशियाँ क्यूँ हो
पिंजरे में, मेरे दोस्त, मुझे बाग़ का हाल बताने से मत डरो। जिस घोंसले पर कल बिजली गिरी थी, वह मेरा घर क्यों हो?
6
ये कह सकते हो हम दिल में नहीं हैं पर ये बतलाओ
कि जब दिल में तुम्हीं तुम हो तो आँखों से निहाँ क्यूँ हो
तुम कह सकते हो कि मैं तुम्हारे दिल में नहीं हूँ, लेकिन यह बताओ कि जब दिल में सिर्फ तुम ही तुम हो तो आँखों से छिपे हुए क्यों हो?
7
ग़लत है जज़्ब-ए-दिल का शिकवा देखो जुर्म किस का है
न खींचो गर तुम अपने को कशाकश दरमियाँ क्यूँ हो
दिल के खिंचाव को दोष देना गलत है; देखो गलती किसकी है। अगर तुम खुद को दूर नहीं खींचते, तो फिर हमारे बीच यह खींचतान क्यों होगी?
8
ये फ़ित्ना आदमी की ख़ाना-वीरानी को क्या कम है
हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उस का आसमाँ क्यूँ हो
क्या यह मुसीबत किसी इंसान के घर की बर्बादी के लिए काफी नहीं है? जिस व्यक्ति के तुम दोस्त बन गए, उसका दुश्मन आसमान क्यों बनेगा?
9
यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यूँ हो
यदि यह आज़माना है, तो सताना किसे कहते हैं? जब तुम शत्रु के हो गए हो, तो मेरी परीक्षा क्यों ली जाए?
10
कहा तुम ने कि क्यूँ हो ग़ैर के मिलने में रुस्वाई
बजा कहते हो सच कहते हो फिर कहियो कि हाँ क्यूँ हो
तुमने कहा कि दूसरों से मिलने में बदनामी क्यों होती है। तुम ठीक कहते हो, सच कहते हो, फिर बताओ कि ऐसा क्यों होता है।
11
निकाला चाहता है काम क्या ता'नों से तू 'ग़ालिब'
तिरे बे-मेहर कहने से वो तुझ पर मेहरबाँ क्यूँ हो
ग़ालिब, तुम ता'नों से क्या काम निकालना चाहते हो? तुम्हारे उसे बे-मेहर कहने से वह तुम पर मेहरबान क्यों होगा?
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