किसी को दे के दिल कोई नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो — मिर्ज़ा ग़ालिब

किसी को दे के दिल कोई नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो न हो जब दिल ही सीने में तो फिर मुँह में ज़बाँ क्यूँ हो

“Why should one lament, having given their heart away? If no heart resides within the chest, why should a tongue then sway?”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

किसी को अपना दिल दे देने के बाद कोई क्यों शिकायत करे या रोए? जब सीने में दिल ही नहीं है, तो फिर मुंह में ज़बान क्यों होनी चाहिए?

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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