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ग़ज़ल

हर क़दम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायाँ मुझ से

ہر قدم دوری منزل ہے نمایاں مجھ سے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 17 shers· radif: से

यह ग़ज़ल अस्तित्वगत अकेलेपन और पीछा करने की व्यर्थता की गहरी भावना को खूबसूरती से व्यक्त करती है। शायर अफ़सोस करता है कि हर कदम पर मंज़िल और दूर होती जाती है, और यहाँ तक कि विशाल जंगल भी उसकी मौजूदगी से भागता है। दिल की पीड़ा इतनी तीव्र है कि तन्हाई की रात में, उसका अपना साया भी उसे छोड़ देता है, एक वीरान आईनाख़ाना पीछे रह जाता है।

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1
हर क़दम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायाँ मुझ से मेरी रफ़्तार से भागे है बयाबाँ मुझ से
हर क़दम पर मंज़िल की दूरी की विशालता मुझसे स्पष्ट होती जाती है; मेरी तेज़ रफ़्तार से बियाबान भी मुझसे दूर भागता है।
2
दर्स-ए-उनवान-ए-तमाशा ब-तग़ाफ़ुल ख़ुश-तर है निगह रिश्ता-ए-शीराज़ा-ए-मिज़्गाँ मुझ से
जीवन के तमाशे का सबक उदासीनता से ज़्यादा मधुर लगता है। मेरी निगाह ही मेरे पलकों का बंधन सूत्र है।
3
वहशत-ए-आतिश-ए-दिल से शब-ए-तन्हाई में सूरत-ए-दूद रहा साया गुरेज़ाँ मुझ से
तन्हाई की रात में, दिल की आग के खौफ से, मेरा साया भी धुएँ की तरह मुझसे दूर भागता रहा।
4
ग़म-ए-उश्शाक़ न हो सादगी-आमोज़-ए-बुताँ किस क़दर ख़ाना-ए-आईना है वीराँ मुझ से
कवि कामना करता है कि प्रेमियों का दुख उनके महबूबों को भोला-भाला या सीधा-सादा न बना दे। वह फिर सोचता है कि उसकी अपनी उपस्थिति ने किस कदर आईने के घर (आत्म-प्रतिबिंब या सौंदर्य का स्थान) को वीरान कर दिया है।
5
असर-ए-आबला से जादा-ए-सहरा-ए-जुनूँ सूरत-ए-रिश्ता-ए-गौहर है चराग़ाँ मुझ से
मेरे छालों के असर से, जुनूँ के रेगिस्तान का रास्ता, मोतियों की माला की तरह, मुझसे जगमगा उठा है।
6
बे-ख़ुदी बिस्तर-ए-तम्हीद-ए-फ़राग़त हो जो पुर है साए की तरह मेरा शबिस्ताँ मुझ से
अगर आत्मविस्मृति परम शांति और विश्राम का बिस्तर बन जाए, तो मेरा कमरा मेरी ही उपस्थिति से, एक परछाई की तरह, पूरी तरह भरा हुआ है।
7
शौक़-ए-दीदार में गर तू मुझे गर्दन मारे हो निगह मिस्ल-ए-गुल-ए-शमा परेशाँ मुझ से
प्रेमी कहता है कि यदि तू मुझे अपने दीदार की चाहत में मार भी डाले, तो भी मेरी नज़र, मोमबत्ती की लौ की तरह, मरने के बाद भी तुझसे परेशान होकर तुझे ही ढूँढती रहेगी।
8
बेकसी-हा-ए-शब-ए-हिज्र की वहशत है है साया ख़ुर्शीद-ए-क़यामत में है पिंहाँ मुझ से
जुदाई की बेबस रातों का खौफ बहुत ज़्यादा है; यहाँ तक कि क़यामत के तेज़ सूरज में भी मेरी परछाई मुझसे छिपी हुई है।
9
गर्दिश-ए-साग़र-ए-सद-जल्वा-ए-रंगीं तुझ से आइना-दारी-ए-यक-दीदा-ए-हैराँ मुझ से
आप से सौ रंगीन नज़ारे एक घूमते प्याले की तरह प्रकट होते हैं, और मेरी एक हैरान आँख उनका दर्पण बनती है।
10
निगह-ए-गर्म से एक आग टपकती है 'असद' है चराग़ाँ ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-गुलिस्ताँ मुझ से
मेरी गर्म निगाह से एक आग टपकती है, असद। मेरे द्वारा बाग़ का सूखा तिनका और कचरा भी रोशनी से जगमगा उठता है।
11
ख़्वाब-ए-जमइय्यत-ए-मख़मल है परेशाँ मुझ से रग-ए-बिस्तर को मिली शोख़ी-ए-मिज़्गाँ मुझ से
मेरी बेचैनी ने मख़मल के आराम और सुकून को भी बिखेर दिया है। मेरी पलकों की शोख़ी से बिस्तर की रगों को भी चुभन और बेचैनी मिल गई है।
12
ग़म-ए-उश्शाक़ न हो सादगी-आमोज़-ए-बुताँ किस क़दर ख़ाना-ए-आईना है वीराँ मुझ से
प्रेमियों का दुख प्रियजनों को सादगी न सिखाए। मेरी वजह से दर्पणों का घर कितना वीरान है।
13
कुंज-ए-तारीक-ओ-कमीं-गीरी-ए-अख़्तर शुमरी 'ऐनक-ए-चश्म बना रौज़न-ए-ज़िंदाँ मुझ से
तुमने एक अंधेरे कोने से छिपकर तारे गिने, और मैंने कारागार के रोशनदान को अपनी आँखों का चश्मा बना लिया।
14
ऐ तसल्ली हवस-ए-वा'दा फ़रेब-अफ़्सूँ है वर्ना क्या हो न सके नाला-ब-सामाँ मुझ से
ऐ तसल्ली, वादे की लालसा एक धोखेबाज जादू है। अन्यथा, मेरे शक्तिशाली विलाप क्या नहीं कर सकते?
15
बस्तन-ए-अहद-ए-मोहब्बत हमा नादानी था चश्म-ए-नकुशूदा रिहा उक़्दा-ए-पैमाँ मुझ से
प्यार का वादा बांधना सरासर नादानी थी। मेरी आँखें अभी खुली भी नहीं थीं कि मुझसे उस वादे की गांठ टूट गई।
16
आतिश-अफ़रोज़ी-ए-यक-शोला-ए-ईमा तुझ से चश्मक-आराई-ए-सद-शहर चराग़ाँ मुझ से
तुमसे एक इशारे की अकेली लौ जलाई जाती है। मुझसे सैकड़ों शहरों की जगमगाती रोशनी का प्रदर्शन होता है।
17
ऐ 'असद' दस्तरस-ए-वस्ल-ए-तमन्ना मा'लूम काश हो क़ुदरत-ए-बरचीदन-ए-दामाँ मुझ से
ऐ असद, अपनी इच्छा की पूर्ति की पहुँच कितनी कठिन है, यह ज्ञात है। काश मुझमें अपना दामन समेटकर इस चाहत से अलग होने की शक्ति होती।
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