ग़ज़ल
ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा
لے چلا جان مری روٹھ کے جانا تیرا
यह ग़ज़ल महबूब के रूठकर चले जाने से उपजी गहरी विरह-वेदना और दिल की तड़प को व्यक्त करती है। इसमें प्रेमी का यह भाव झलकता है कि ऐसे पीड़ादायक मिलन से न मिलना ही बेहतर था, साथ ही वह महबूब के राज़ और यादों को ज़माने की नज़रों से महफ़ूज़ रखने की चाहत भी रखता है।
Source: rekhta · HI
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1
ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा
2
अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा
सब ने जाना जो पता एक ने जाना तेरा
3
तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परेशान रहा करती है
किस के उजड़े हुए दिल में है ठिकाना तेरा
4
आरज़ू ही न रही सुब्ह-ए-वतन की मुझ को
शाम-ए-ग़ुर्बत है अजब वक़्त सुहाना तेरा
5
ये समझ कर तुझे ऐ मौत लगा रक्खा है
काम आता है बुरे वक़्त में आना तेरा
6
ऐ दिल-ए-शेफ़्ता में आग लगाने वाले
रंग लाया है ये लाखे का जमाना तेरा
7
तू ख़ुदा तो नहीं ऐ नासेह-ए-नादाँ मेरा
क्या ख़ता की जो कहा मैं ने न माना तेरा
8
रंज क्या वस्ल-ए-अदू का जो तअ'ल्लुक़ ही नहीं
मुझ को वल्लाह हँसाता है रुलाना तेरा
9
काबा ओ दैर में या चश्म-ओ-दिल-ए-आशिक़ में
इन्हीं दो-चार घरों में है ठिकाना तेरा
10
तर्क-ए-आदत से मुझे नींद नहीं आने की
कहीं नीचा न हो ऐ गोर सिरहाना तेरा
11
मैं जो कहता हूँ उठाए हैं बहुत रंज-ए-फ़िराक़
वो ये कहते हैं बड़ा दिल है तवाना तेरा
12
बज़्म-ए-दुश्मन से तुझे कौन उठा सकता है
इक क़यामत का उठाना है उठाना तेरा
13
अपनी आँखों में अभी कौंद गई बिजली सी
हम न समझे कि ये आना है कि जाना तेरा
14
यूँ तो क्या आएगा तू फ़र्त-ए-नज़ाकत से यहाँ
सख़्त दुश्वार है धोके में भी आना तेरा
15
'दाग़' को यूँ वो मिटाते हैं ये फ़रमाते हैं
तू बदल डाल हुआ नाम पुराना तेरा
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