ग़ज़ल

लुत्फ़ वो इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है

لطف وہ عشق میں پائے ہیں کہ جی جانتا ہے
दाग़ देहलवी· Ghazal· 5 shers· radif: हैं कि जी जानता है

यह ग़ज़ल प्रेम के गहरे अंतर्विरोधों, उसके असीम आनंद और विरह की असहनीय पीड़ा को बयां करती है। शायर कहता है कि ज़माने के सितम चाहे जो भी हों, महबूब से मिले सुख और दिल को पहुंची तड़प की गहराई को केवल उसका अपना दिल ही समझ सकता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
लुत्फ़ वो इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है रंज भी ऐसे उठाए हैं कि जी जानता है
मैंने इश्क़ में ऐसे आनंद पाए हैं जिन्हें सिर्फ़ मेरा दिल जानता है, और ऐसे दुख भी उठाए हैं जिन्हें सिर्फ़ मेरा दिल ही समझता है।
2
जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने तू ने दिल इतने सताए हैं कि जी जानता है
दुनिया के जो सितम हैं उन्हें दुनिया ही जाने, लेकिन तुमने दिलों को इस कदर सताया है कि इसका दर्द सिर्फ मेरा दिल ही जानता है।
3
तुम नहीं जानते अब तक ये तुम्हारे अंदाज़ वो मिरे दिल में समाए हैं कि जी जानता है
तुम अभी तक यह नहीं जानते कि तुम्हारी ये अदाएं और अंदाज़ मेरे दिल में इस कदर बस गए हैं कि यह बात सिर्फ मेरा दिल ही जानता है।
4
इन्हीं क़दमों ने तुम्हारे इन्हीं क़दमों की क़सम ख़ाक में इतने मिलाए हैं कि जी जानता है
तुम्हारे इन्हीं क़दमों की क़सम, इन्होंने इतने लोगों को ख़ाक में मिलाया है कि यह बात सिर्फ़ मेरा दिल ही जानता है।
5
दोस्ती में तिरी दर-पर्दा हमारे दुश्मन इस क़दर अपने पराए हैं कि जी जानता है
आपकी दोस्ती के पर्दे के पीछे हमारे दुश्मन छिपे हैं, और हमारे अपने इस हद तक अजनबी और पराए हो गए हैं कि यह बात केवल मेरा दिल ही जानता है।
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